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Sam Manekshaw (Sam Bahadur) और सेना में जातिगत आरक्षण विवाद का बिहार के साथ क्या सम्बंध है?

सैम बहादुर (Sam Bahadur) मतलब सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के सबसे बड़े हीरो माने जाते हैं जिन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ दो और चीन के ख़िलाफ़ दो युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। लेकिन Sam Bahadur के जीवन का एक ऐसा भी पक्ष है जिससे दलित और पिछड़े समाज के लोग सहमत नहीं होगे और Sam Bahadur के जीवन के उस पक्ष का बिहार के साथ बहुत गहरा सम्बंध है। 

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जब साल 1970 में बिहार के दलित नेता जगजीवन राम भारत के रक्षा मंत्री बने तो उसके बाद उन्होंने कई बार प्रयास किया था कि भारतीय सेना में भी जातिगत आरक्षण का प्रावधान किया जाए। साल 1972 में उन्होंने भारतीय सेना को एक पत्र लिखा और उनसे पूछा कि भारतीय सेना में दलितों का प्रतिनिधित्व कितना है। उस समय भारतीय सेना का नेतृत्व Sam Bahadur कर रहे थे। चिट्ठी पढ़ने के बाद Sam Bahadur को अटपटा लगा लेकिन चुकी जगजीवन राम देश के रक्षा मंत्री थे तो जवाब तो देना ही था। 

जगजीवन राम और Sam Bahadur:

सेना की तरफ़ से जवाब देने का काम दिया गया Adjutant General लेफ़्टिनेंट जेनरल S K सिन्हा को। इत्तेफ़ाक की बात थी कि जगजीवन राम भी बिहार के थे और सिन्हा जी भी बिहार के ही थे। जवाब में S K सिन्हा ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर सूचित किया कि सेना में लगभग एक प्रतिशत दलित जवान हैं। सेना के इस जवाब के बाद रक्षा मंत्री जगजीवन राम ने Sam Bahadur को और पत्र लिखकर यह पूछा कि जब भारत सरकार पहले ही फ़ैसला ले चुकी है कि भारतीय सेना में दलितों को 15% और आदिवासियों को 7.5% आरक्षण दिया जाएगा तो फिर इस फ़ैसले का पालन क्यूँ नहीं किया गया है? 

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जब यह आदेश Sam Bahadur के पास पास पहुँचा तो वो आग बबूला हो गए और भारत के रक्षा मंत्री को पागल तक बोल दिया था। ये वो दौर था जब Sam Bahadur के ऊपर कोई कुछ बोल नहीं पाता था। ये वो दौर था जब 1971 का युद्ध जितने के बाद Sam Bahadur देश के हीरो थे और इंदिरा गांधी भी उनके बार में कुछ बोलने से पहले सौ बार सोचती थी। लेकिन सेना को रक्षा मंत्री के सवाल का जवाब तो देना था। 

इस बार फिर से जिस व्यक्ति को सेना की तरफ़ से जवाब देने का दायित्व दिया गया वो भी बिहारी ही थे। ब्रिगेडियर S K सिन्हा, स्रीनिवास कुमार सिन्हा को यह पत्र लिखने को बोला गया जो आगे चलकर लेफ़्टिनेंट जेनरल भी बने थे। S K सिन्हा ने बाद में 1992 में एक किताब भी लिखा था जिसका नाम था “A Soldier Recalls.” इसके बाद सिन्हा जी जम्मू और कश्मीर के साथ साथ आसाम का भी राज्यपाल बने थे। 

सैनिक
Army and Nation किताब का मुख्य पृष्ठ जिसमें Sam Bahadur के बारे में ज़िक्र है।

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भारतीय सेना की तरफ़ से S K सिन्हा द्वारा रक्षा मंत्री को लिखे गए जवाब पत्र में लिखा गया कि जब देश में आरक्षण लागू हुआ था तब पहले से ही यह तय था कि सेना समेत कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां आरक्षण लागू नहीं होगा। पत्र में यह भी लिखा गया कि सेना में अफ़सर रैंक तो नहीं लेकिन जवानों में पहले से ही पंद्रह प्रतिशत से अधिक दलित हैं।

रक्षा मंत्री को यह भी बताया गया कि भारतीय सेना में महार रेजिमेंट भी है और प्रत्येक रेजिमेंट में सफ़ाईकर्मी, धोबी, मोची, नाई जैसे काम के लिए 75-100 लोग हैं और ये सभी दलित-पिछड़ी जातियों से ही हैं। रक्षा मंत्री को यह भी बताया गया कि जब देश आज़ाद हुआ था तब भारतीय सेना में एक भी दलित ऑफ़िसर नहीं थे लेकिन साल 1972 आते आते दलित सेना ऑफ़िसर की संख्या लगभग एक प्रतिशत हो चुकी थी। 

दरअसल जगजीवन राम अक्सर भारतीय सेना पर यह भी आरोप लगाते थे कि भारतीय सेना में बैलेन्स नहीं है क्यूँकि भारतीय सेना में ज़्यादातर संख्या पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लोगों का है और उनमें से भी ज़्यादातर उच्च जाति के लोगों का है। जगजीवन राम के इस तरह के बयान का पंजाब के लोगों ने कई बार विरोध भी किया। 

ब्रिटिश सेना और जाति का सवाल:

दरअसल सेना में ब्रिटिश काल से ही कुछ ख़ास विशेष वर्ग के लोगों को लिया जाता था। 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सेना में ऐसे जाति या समूह के लोगों को ब्रिटिश सेना से प्रतिबंधित कर दिया था जो विद्रोही प्रवृति के थे या फिर जो लड़ाकू प्रवृति की जातियाँ नहीं थे। उदाहरण के लिए 1857 की क्रांति के बाद भूमिहारों को सेना से प्रतिबंधित कर दिया गया था क्यूँकि मंगल पांडे भी भुमिहार ही थे।

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इसी तरह से ब्रिटिश सेना में दलित जातियों को जगह नहीं मिलती थी क्यूँकि दलितों को लड़ाकू प्रजाति नहीं समझा जाता था। हालाँकि 1940 का दशक आते आते ब्रिटिश सेना ने अपनी नीति बदली और महार रेजिमेंट का गठन भी किया जो पूरी तरह दलितों की सेना थी। महार महाराष्ट्र की एक दलित जाति होती है और बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर भी इसी महार जाति से सम्बंध रखते थे। महार रेजिमेंट बनने के बाद भारतीय सेना में सैनिकों के पद पर दलितों की नियुक्ति होने लगी थी लेकिन आज़ादी के समय ब्रिटिश सेना में एक भी ऑफ़िसर दलित नहीं था। 

ये सारी जानकारी आपको Steven I Wilkinson की किताब Army and Nation में मिल जाएगी। इसके अलावा कुछ अन्य किताबें और लेख भी लिखे गए है इस विषय पर। जैसे कि ‘India’s war: The making of modern South Asia’ (1939-1945), By Srinath Raghavan, और Stephen Cohen द्वारा साल 1969 में लिखित लेख “The Untouchable Soldier: Caste, Politics, and the Indian Army”, जो ‘Journal of Asian Studies’ में छापा था। 

सेना और आरक्षण: नया विवाद

इससे पहले साल 1948 में भी सेना में जातिगत आरक्षण का विवाद उठा था जब संविधान सभा ने उस समय के सेना प्रमुख जेनरल करियाप्पा को पत्र लिखकर इस विषय पर जवाब माँगा था। उस समय रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह थे। करियाप्पा ने बलदेव सिंह को लिखे एक पत्र में यह मानने से साफ इंकार कर दिया कि सेना में किसी तरह का आरक्षण लागू होना चाहिए।  

दावा किया जाता है कि इंदिरा साहनी केस में भी सेना में आरक्षण के फ़ैसले पर सर्वोच्च न्यायलय ने इंकार कर दिया था। इसके बाद जुलाई 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से सेना में आरक्षण लागू करने सम्बन्धी रिट पिटिसन पर सुनवाई किया ख़ारिज कर दिया। । सेना में आरक्षण के विवाद को फिर से हवा तब मिली जब मोदी सरकार के मंत्री रामदास अठावले ने मोदी सरकार से सेना में आरक्षण लागू करने का आग्रह किया। इससे पहले सचर कमिटी की रिपोर्ट में भी जाति के आधार पर सेना में आरक्षण लागू करने का सुझाव दिया गया था। 

सेना और आरक्षण का विवाद बहुत पुराना है लेकिन उसका बिहार के साथ सम्बंध महत्वपूर्ण है, बिहार के लिए भी और बिहारियों के लिए भी। अब जब Sam Bahadur के जीवन पर Sam Bahadur के नाम से ही एक फ़िल्म बन चुकी है तो इस विषय पर चर्चा ज़रूरी है।

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Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
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