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Bilkis Bano Case: सर्वोच्च न्यायालय का न्याय और भाजपा का अन्याय

Bilkis Bano मामले में जिस परिहार बोर्ड मतलब रेमिशन बोर्ड ने 19 वर्षीय एक गर्भवती बच्ची बिलक़िस बानो के साथ रेप और उसका तीन वर्षीय एक बच्चा के साथ उसके परिवार के छह अन्य सदस्यों की हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 11 अपराधियों की सजा माफ़ कर दी थी उस गुजराती परिहार बोर्ड में दस में से छह सदस्य मतलब आधे से ज़्यादा सदस्य भाजपा के न केवल कार्यकर्ता थे बल्कि उनमें से दो भाजपा का विधायक भी थे। इन दो विधायकों के अलावा एक भाजपा के पूर्व पार्षद थे और दो भाजपा के पदाधिकारी थे। और एक अन्य सदस्य भाजपा का कार्यकर्ता था।

मतलब साफ़ था कि कि ये अपराधियों की अदालत थी जिसमें अपराधी का परिवार और रिस्तेदार जज बना हुआ था।  इतना ही नहीं इन छह सदस्यों में से एक सदस्य तो ऐसे थे जिन्हें गोधरा रेल अग्नि-कांड में गवाह के तौर पर पेश किया गया था और न्यायलय ने इनकी गवाही को भ्रामक और झूठा बताते हुए इन्हें गवाह मानने से इंकार कर दिया था। जो खुद न्यायलय को पहले ही गुमराह कर चुका था, उसी मामले में, उसे जज बना दिया गया था। कोर्ट के सामने एक झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति के रूप में साबित हो चुके उस व्यक्ति को इतने संवेदनशील मामले की कमिटी का सदस्य बना दिया जाता है। 

आज हम खोलेंगे कुंडली, गुजरात परिहार बोर्ड के उन छह सदस्यों की जो भाजपा के नेता हैं। इसके साथ साथ आज ये भी जानेंगे कि देश के अन्य राज्यों के परिहार बोर्ड के बारे में भी, कि भारत के अलग अलग राज्यों के परिहार बोर्ड का क्या प्रारूप होता है और कौन उसके सदस्य होते हैं और कैसे अन्य राज्यों के परिहार बोर्ड गुजरात के परिहार बोर्ड से अलग हैं। हम परिहार बोर्ड के क़ानूनी प्रावधान के बारे में भी बात करेंगे।  सबसे पहले शुरू करते हैं उन नियमों से जिन नियमों को ताक पर रखकर गुजरात में बिलक़िस बानो केस के अपराधियों को सजामाफ़ी दी गई थी। 

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नम्बर 1: इस केस की सुनवाई मुंबई उच्च न्यायालय में हुई थी, गुजरात में नहीं हुई थी, इसलिए इस केस में सजा पाने वाले अपराधी माफ़ीनामा सिर्फ़ मुंबई उच्च न्यायालय में कर सकते थे लेकिन अपराधियों ने माफ़ीनामा की अपील अहमदाबाद उच्च न्यायालय में किया और हैरत की बात तो ये है कि अहमदाबाद उच्च न्यायलय ने इस अपील को स्वीकार भी कर लिया। 

इस माफ़िनामे का दूसरा घपला: इस केस की जाँच केंद्रीय एजेंसी CBI ने किया था और नियम के अनुसार जिस भी केस की जाँच CBI करती है उस केस के अपराधियों की सजामाफ़ी बिना CBI की सहमति से नहीं होनी चाहिए। आख़री जाँच CBI ने किया है तो उस अपराध और अपराधी की प्रवृति भी तो CBI को ही मालूम हो सकती है तो फिर बिना CBI के सुझाव के ऐसे अपराध के अपराधियों की सजा माफ़ कैसे हो सकती है। 

मतलब इस केस का जिस CBI ने जाँच किया उससे सलाह लिया नहीं गया, जिस मुंबई उच्च न्यायालय ने केस की सुनवाई करके सबको उम्र क़ैद की सजा दिया उससे कोई सलाह लिया नहीं गया और बिना उनके सलाह के इन अपराधियों की सजा माफ़ कर दी गई। 

तीसरा घपला: क़ानून के अनुसार माफ़िनामे के लिए अपील करने का अधिकार सभी को है लेकिन जिस अपराध में मासूम बच्चों की हत्या किया गया, नाबालिग लड़कियों का बलात्कार किया गया हो, और अपराध क्रूरता के साथ किया गया हो ऐसे मामलों में माफ़ीनामा किसी क़ीमत पर नहीं दिया जा सकता है।

क्या एक 19 वर्षीय गर्भवती बच्ची जिसके पेट में पाँच महीने का एक बच्चा हो, जिसके गोद में तीन साल का एक बच्चा हो, उसके साथ एक दर्जन लोग सामूहिक बलात्कार करें, उसके कोख में पल रहे बच्चे को मारे दें, उसके गोद में खेल रहे बच्चे की हत्या उसके आँखों के सामने कर दे और उसके साथ साथ उसके परिवार के अन्य 6 सदस्यों की भी हत्या कर दे, इससे भी अधिक जघन्य, क्रूर और वाहसी कोई अपराध हो सकता है क्या? और ऐसे अपराधियों को सारे क़ानून को ताक पर रखकर माफ़ीनामा दिया जा सकता है क्या?  

चौथा घपला: जिस गुजरात परिहार बोर्ड ने इन अपराधियों की सजा को माफ़ किया उस परिहार बोर्ड के 10 में से 6 सदस्य भाजपा ने नेता हैं। अब सबसे पहले गुजरात परिहार बोर्ड के उन छह सदस्यों की कुंडली समझ लेते हैं जिनका भाजपा के साथ गहरे समबंध है। 

Bilkis Bano परिहार बोर्ड के सदस्य:

सी के राउलजी – सीके राउलजी लगातार दो बार 2012 और 2017 में गोधरा (विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र) से विधायक रह चुके है। लेकिन वो विधायक कांग्रेस के टिकट पर जीते थे भाजपा के टिकट पर नहीं जीते थे। अक्टूबर 2017 में ये कांग्रेस से पलटी-मारकर भाजपा में शामिल हो गए थे। 19 अगस्त 2022 को सीके राउलजी ने सजा काट रहे उन 11 अपराधियों के बारे में कहा था ,

“मुझे नहीं पता कि उन्होंने अपराध किया है या नहीं। वे ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण अच्छे संस्कार के लिए जाने जाते हैं।” जनता दल के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले राउलजी 1991 में भाजपा में शामिल हो गए थे फिर कांग्रेस में आ गए थे और 2012 के विधानसभा चुनाव गोधरा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते और अक्तूबर 2017 में फिर से भाजपा में लौट आए थे। 

सुमन बेन चौहान – सुमनबेन चौहान गुजरात की कलोल विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक हैं जो गुजरात के पंचमहल जिले में है। वह गोधरा ट्रेन जलने की घटना की प्रमुख गवाहों में से एक थे, वो पंचमहल के पूर्व सांसद प्रभातसिंह चौहान की बहू हैं और पहली बार बीजेपी से विधायक भी बनी थी।

मुरली मूलचंदानी- गोधरा से भाजपा के पूर्व नगर निगम पार्षद। मूलचंदानी को गोधरा ट्रेन नरसंहार मामले में अभियोजन पक्ष ने एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में पेश किया था जिसमें अयोध्या से लौट रहे 59 तीर्थयात्रियों को जिंदा जला दिया गया था। अदालत ने मूलचंदानी सहित दो अन्य लोगों की गवाही को भी  झूठा करार दे दिया था।  

चौथे नम्बर पर हैं स्नेहबेन भाटिया  जो भाजपा महिला मोर्चा की एक कार्यकर्ता- पार्टी की गोधरा शहर इकाई के सचिव भी हैं। 

पाँचवें नम्बर पर हैं विनीता लेले- इन्हें गुजरात परिहार बोर्ड में एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दिखाया गया है, जबकि उनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल कहती है कि वह भाजपा के सदस्य और कार्यकर्ता हैं। 

और छठ नम्बर पर हैं, पवनभाई सोनी- जो भाजपा की राज्य कार्यकारी समिति का सदस्य हैं, इनका नाम गुजरात भाजपा के वेबसाइट पर भी लिखा हुआ था। उनका पता और संपर्क नंबर पार्टी की वेबसाइट पर भी पाया जा सकता है, हालांकि इनका भी  नाम भी गुजरात परिहार बोर्ड में एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर ही दर्ज है।

उत्तर प्रदेश का परिहार बोर्ड:

दस में से छह सदस्य भाजपा के होने के बाद भी गुजराती परिहार बोर्ड ने बिलक़िस बानो के केस में परिहार बोर्ड के क़ानून के अनुसार काम नहीं किया। गुजरात का परिहार बोर्ड अपने आप में एक अजूबा परिहार बोर्ड है। देश के सभी राज्यों में परिहार बोर्ड है लेकिन गुजरात जैसा कहीं नहीं।

योगी बाबा के उत्तर प्रदेश के परिहार बोर्ड के नियम में यह साफ साफ लिखा हुआ है कि परिहार बोर्ड उम्रक़ैद की सजा काट रहे उसी अपराधी की सजा माफ़ कर सकती है जिसकी उम्र कम से कम 60 साल हो, और वो कम से कम बीस साल की सजा काट चुका हो। लेकिन गुजरात के मामले में बिलक़िस बानो के मामले जिन 11 अपराधियों की सजा माफ़ की गई थी उसमें से किसी की भी न तो उम्र 60 साल से अधिक थी और न ही किसी ने 20 साल सजा काटी थी।

बाबा के उत्तर प्रदेश वाले परिहार बोर्ड के नियम में यह भी लिखा हुआ है कि अगर अपराधी को सजा किसी केंद्रीय जाँच एजेंसी मतलब CBI, ED द्वारा की गई जाँच के आधार पर सजा दी गई है तो उसमें राज्य का परिहार बोर्ड सजा माफ़ नहीं कर सकती है। इसके अलावा बाबा के उत्तर प्रदेश वाले परिहार बोर्ड के क़ानून के अनुसार अगर सजा उत्तर प्रदेश के बाहर के किसी न्यायलय ने दिया है तो उत्तर प्रदेश का परिहार बोर्ड सजा माफ़ नहीं कर सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण अगर आप बाबा के उत्तर प्रदेश में कोई अपराधी रेप, हत्या या किसी भी तरह के बाल अपराध के कारण उम्रक़ैद की सजा काट रहा हैं तो उस अपराधी को माफ़ीनामा किसी क़ीमत पर नहीं मिल सकती है। मतलब अगर गोधरा कांड बाबा के उत्तर प्रदेश में होता तो बिलक़िस केस के अपराधियों को कभी माफ़ी नहीं मिलती। और उससे भी महत्वपूर्ण, बाबा के उत्तर प्रदेश के परिहार बोर्ड में सिर्फ़ पाँच सदस्य होते हैं और पाँचों के पाँचों सरकारी अधिकारी होते हैं, इसलिए भाजपा क्या किसी भी पार्टी का कोई सदस्य या कोई मंत्री, विधायक या सांसद भी उत्तर प्रदेश के परिहार बोर्ड का सदस्य नहीं बन सकता है। 

अन्य राज्यों के परिहार बोर्ड के नियम क़ानून भी उत्तर प्रदेश के जैसा ही है, इसमें अजूबा सिर्फ़ एक गुजरात आ ही परिहार बोर्ड है जिसमें आधे से ज़्यादा सदस्य भाजपा के कार्यकर्ता और भाजपा के पदाधिकारी बन जाते हैं। कर्नाटक में तो किसी भी आतंकी हमले में शामिल अपराधी को किसी भी क़ीमत पर सजा माफ़ी नहीं मिलती है फिर चाहे वो उम्र क़ैद की सजा काट रहा हो या दो साल की। इसी तरह दो से अधिक हत्या करने वाले अपराधी को भी माफ़िनाम नहीं मिलता है कर्नाटक में। 

माफ़िनामे का नियम-क़ानून:

भारतीय संविधान के अनुसार किसी भी अपराधी को माफ़िनाम या तो राष्ट्रपति दे सकते हैं, या राज्य के राज्यपाल दे सकते हैं या फिर राज्य का परिहार बोर्ड दे सकता है। और ऐसे मामले जिसमें राज्य का परिहार बोर्ड सजा नहीं दे सकती है जैसा कि हमने ऊपर बताया, ऐसे मामलों में सजामाफ़ी सिर्फ़ राष्ट्रपति दे सकते हैं जबकि राज्यपाल सिर्फ़ राष्ट्रपति को अपील कर सकते हैं। उदाहरण के लिए साल 2015 में राजीव गांधी के हत्यारों को 31 साल सजा काटने के बाद राष्ट्रपति द्वारा सजमाफ़ी दे दिया गया था।

इसी तरह जेसिका लाल हत्याकांड में मनु शर्मा को 23 साल सजा काटने के बाद माफ़ी मिली थी और वो भी चार बार आवेदन देने के बाद। मनु शर्मा का तीन ऐप्लिकेशन राष्ट्रपति द्वारा रेजेक्ट कर दिया गया था जबकि जेसिका लाल का परिवार सार्वजनिक तौर पर मनु शर्मा को माफ़ कर चुका था उसके बवजूद राष्ट्रपति ने तीन बार मनु शर्मा के माफ़ी नामे को रेजेक्ट किया था। 

लेकिन गुजरात सरकार का परिहार बोर्ड सभी नियमों को ताक पर रखकर बिलक़िस बानो केस के अपराधियों की सजा माफ़ कर दी थी। हालाँकि आश्चर्य ये भी है कि जून 2022 में ही मोदी सरकार ने सजामाफ़ी के लिए सभी राज्यों को दिशा निर्देश दिए थे और मोदी सरकार के इस दिशानिर्देश के अनुसार निम्नलिखित प्रकार के दोषी को समय से  पहले रिहा नहीं किया जा सकता है :-

  1.   पहला अगर अपराधी मृत्युदंड या उम्रकैद की सजा काट रहा हो 
  2.   दूसरा अगर अपराधी बलात्कार, आतंक, दहेज हत्या और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में दोषी हो 
  3.  तीसरा  एक्सप्लोसिव एक्ट, द नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, द ऑफिशियल सिक्रेट्स एक्ट, एंटी हाईजैकिंग एक्ट, और मानव तस्करी के मामले में सजा काट रहे अपराधी को सजामाफ़ी नहीं दिया जा सकता है। 

लेकिन मोदी सारकर के ये दिशा निर्देश सम्भवतः गुजरात पर लागू नहीं होता है क्यूँकि अगर मोदी सरकार के ये नियम ये दिशा-निर्देश गुजरात पर लागू रहते तो बिलक़िस बानो मामले में अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए बिलक़िस बानो को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा नहीं खटखटाना पड़ता, गुजरात परिहार बोर्ड द्वारा अपराधियों को सजा माफ़ी देने के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अपील नहीं करना पड़ता, लेकिन गुजरात सरकार के इन तिकड़मों के बवजदु बिलक़िस को न्याय मिलता है, देश की सर्वोच्च न्यायालय बिलक़िस को न्याय देता है, इस देश में न्याय व्यवस्था आज भी ज़िंदा है।

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Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
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