HomeHimalayasक्या ढोल और दमाउ पहाड़ी सामाजिक भेदभाव की संस्कृति का प्रतीक है...

क्या ढोल और दमाउ पहाड़ी सामाजिक भेदभाव की संस्कृति का प्रतीक है ?

उत्तराखंड के सभी हिस्सों में ढोल और दमाउ सांस्कृतिक पहचान है लेकिन इसको बजाने वाले लोगों को जातिगत व्यवस्था में निम्न स्थान दिया गया है और उन्हें भेदभाव के नज़रिए से देखा जाता है।

जिस तरह से आज ढोल और दमाउ को पहाड़ी संगीत और संस्कृति का प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है क्या इतिहास में भी ढोल और दमाउ को उसी नज़रिए से देखा जाता था? शायद नहीं, कम से कम पहाड़ी कहावतें तो कुछ इसी ओर इशारा करती है। 

कहावत 1. ढोल दमाउ मा कमच्यों को राग (The soft song of the Koncha (fiddlers and minstrels) amidst the beating of big drums). 

कम से कम उपरोक्त पहाड़ी कहावत ढोल और दमाउ को कमच्यों को बेसुरा ही आंकता है। कमच्यों, मंजीरा, गिटार जैसे वाध-यंत्रों जैसा ही एक पहाड़ी वाध्यंत्र है जिसे ज़्यादातर नाच-औरतों के नृत्य में बजाया जाता था। ऐसे और भी कई कहावत हैं जिससे प्रतीति होता है कि ढोल और दमाउ को महज़ एक शोर-गुल करने वाला वाध्यंत्र माना जाता था। ज़्यादातर मौक़े या उपलक्ष्य जब ढोल और दमाउ बजाया जाता था उसका उद्धेश्य शोर-गुल करना हुआ करता था। शायद यही कारण है कि आगे चलकर ब्रिटिश काल के दौरान ढोल और दमाउ को सुरीला बनाने के लिए एक अंग्रेज़ी वाध्यंत्र मसुकबाज (Bagpipes) जोड़ा गया। 

198595225 3690856404352372 1690099498274525141 n
चित्र: ढोल और दमाउ के साथ उत्तराखंड के कलाकार

इतना ही नहीं ढोल और दमाउ बजाने वाले व्यक्तियों को समाज ने कभी सम्मान की नज़र से नहीं देखा। ढोल और दमाउ बजाने वाले व्यक्तियों से सम्बंधित भी कई पहाड़ी कहावतें हैं जो उनके अपमान में रचा गया था। उदाहरण के तौर पर: 

  1. कहावत 2. और न देंद हाको डाको आप रांडन हुड़किया  राखो (A female who lectures others on chastity is herself in love with a drummer (Hurhakiya is a man of the lowest caste even among the Dumas)

गढ़वाल में ढोल बजाने वाले कुल का नाम ‘दास’ है जिसमें मुख्यतः तीन उपजातियाँ है: औजी, बजगि, या ढोली। कुमाऊँ में ढोल बजाने वाले को ढोली और दमाऊ बजाने वाले को दमाई कहा जाता है। ये तथाकथित निम्न जाती से सम्बंध रखते हैं लेकिन इनके बिना कोई पूजा-पाठ या शुभ या अशुभ मुहरत नहीं सम्पन्न हो सकता है। 

हालाँकि केदारनाथ मंदिर में रोज़ शाम को आरती के समय ढोल बजाने वाला दास को मंदिर समिति के खाने के मेस में ये कहकर घुसने नहीं दिया जाता है कि वो अछूत है। गंगोत्री में नोबत बनाने वाले औजी को भी मंदिर समिति से सिर्फ राशन मिलता है। आजीविका के लिए वो गंगाजली की बोतल को लाख से सील कर बेचते हैं। मंदिर के सामने बनी उनकी कच्ची झोपड़ी को पक्की करने की इजाज़त उन्हें मंदिर समिति नहीं देता है। 

“डोल और दमाउ सिर्फ़ निम्न जाति के लोग बजाते हैं”

इसके अलावा ढोल और दमाउ का धार्मिक पक्ष भी है। माना जाता है कि जब भी बजाया जाय तो ढोल और दमौं एक साथ ही बजाया जाना चाहिए। ढोल का दायां ताल लकड़ी और बायाँ ताल नंगे हाथ से बजाया जाता है। माना ये भी जाता है कि दायां ताल पुरुष होता है और बायाँ ताल महिला। बायाँ ताल कम आवाज़ करता है और दायां अधिक। यानी कि महिला कम आवाज़ करेगी और पुरुष अधिक।  

Dhol Damo H

ये भी पढ़ें: पहाड़ में जाति या जाति में पहाड़: पहाड़ी कहावतों की ज़ुबानी

दमौं का एक ही ताल होता है जिसे दोनो हाथ में लकड़ी से बजाया जाता है इसलिए दमौं पूरा का पूरा पुरुष होता है। दमाउ अकेले बज सकता है क्यूँकि दमाउ में पुरुष हैं लेकिन ढोल अकेले नहीं बजना चाहिए। ढोल महिला है। जैसे लड़की की शादी के दौरान केला लाने या बारातियों के स्वागत के समय सिर्फ़ दमाउ बजाया जाना चाहिए। 

ढोल और महिला के बीच के सम्बंध दर्शाती भी कई पहाड़ी कहावतें हैं। उदाहरण के तौर पर: 

कहावत 3. रांड की मुंडली ढोल की कुंडली कसीक भलो बुलाँद (The head of a woman and that of a drum give good sound when well tied and beaten).

शक्ति (पार्वती) के बिना शिव की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। और ढोल-डमरू तो शिव का प्रिय है। जब शिव और शक्ति मिलती है तो बारह ताल बनते हैं जिसे अलग अलग उपलक्ष्य और अलग अलग माहौल के अनुसार बजाया जाता है।

इसे भी पढ़े: पहाड़ का किताब ऋंखला: 2 (Proverbs & Folklore of Kumaun And Garhwal)

Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Current Affairs