HomeCurrent Affairsललन सिंह (JD-U) की राजनीतिक यात्रा: 2003 से 2023 तक

ललन सिंह (JD-U) की राजनीतिक यात्रा: 2003 से 2023 तक

पिछले कुछ दिनों से बिहार की मीडिया में फिर से प्रचंड लेवल का मीडिया भविष्यवाणी हो रही है। वैसे भी नीतीश कुमार जैसे मोस्ट अन्प्रेडिक्टबल नेता वाले बिहार में प्रिडिक्शन भी प्रचंड लेवल का ही होगी। बिहारी मीडिया की नज़रों में एक झटके में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार बन जाते हैं तो दूसरे झटके में गोवा के राज्यपाल बन जाते हैं, तीसरे पल में महगठबँधन टूट जाता है और बिहार में फिर से NDA की सरकार बन जाती है, चौथे पल में बिहार में नीतीश की सरकार गिर जाती है ललन सिंह JDU तोड़कर RJD के साथ सरकार बना लेते हैं और खुद उप-मुख्यमंत्री बन जाते हैं।

Lalan Singh की राजनीतिक यात्रा : 2003 से 2023 तक | News Hunters |

कोई कहता है कि नीतीश कुमार ललन सिंह को ठिकाने लगाने के लिए अशोक चौधरी का इस्तेमाल कर रहे हैं तो कोई कहता है कि नीतीश कुमार अशोक चौधरी को ठिकाने लगाने के लिए ललन सिंह का इस्तेमाल कर रहे हैं। सच्चाई क्या है ये तो नीतीश कुमार ही जाने या फिर रोज़ अपना भविष्यवाणी बदलने वाले बिहारी मीडिया के पंडित जाने। हम किसी तरह का भविष्यवाणी नहीं करना जानते हैं लेकिन इतिहास के सहारे आपको मदद कर सकते हैं ताकि आप भी इस मुद्दे पर तार्किक ढंग से कुछ सोच पाए, अपना विचार बना पाएँ। आज बात सिर्फ़ ललन सिंह के और उनसे सम्बंधित अफ़वाहों के बारे में। 

प्रदेश अध्यक्ष:

चलते हैं पूरे 14 साल पहले 25 सितम्बर 2009 को, ललन सिंह मुंगेर से सांसद निर्वाचित होने के बाद पहली बार अपने क्षेत्र में प्रवास कर रहे थे। अगले दिन यानी 26 तारीख़ को उनका हथिदह में प्रोग्राम था। वो समय था गणेश पूजा का, ललन बाबू जगह जगह, पंडाल पंडाल घूम रहे थे। 25 तारीख़ की शाम को वो लखीसराय के एक पंडाल में थे, पटना से खबर आइ कि नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाने का फ़ैसला ले रहे है और घोषणा कभी भी हो सकती है।

उस समय ललन बाबू के पास एक जिप्सी भी हुआ करती थी। अपनी जिप्सी में एक गार्ड और एक ड्राइवर को बैठाए और सरपट पटना की तरफ़ भागे, देर रात वो पटना पहुँचे, शरद यादव और खुद नीतीश कुमार के प्रयास से मामला शांत हुआ लेकिन झगड़ा ख़त्म नहीं हुआ था। अगले 6 महीने तक ये खिचा-तानी चलता रहेगा और अंततः फ़रवरी 2010 में राजीव रंजन उर्फ़ ललन सिंह ने JDU के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

इस इस्तीफ़े को रोकने के लिए JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने सभी सम्भव प्रयास किया था लेकिन शरद यादव सफल नहीं हुए। माना जाता है कि आख़री मीटिंग जिसमें शरद यादव ने इस झगड़े को ख़त्म करने का प्रयास किया वो हुआ था पटना के गेस्ट हाउस में जिसमें नीतीश कुमार भी मौजूद थे और इस मीटिंग में ललन सिंह शरद यादव का हाथ झटक कर बीच मीटिंग से निकल गए थे। इसके बाद ललन सिंह पर ये भी आरोप लगा कि ललन सिंह पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने से पहले पार्टी फंड का लगभग आठ करोड़ रुपया अपने साथ ले गए। 

विद्रोह:

इसके बाद अगले तीन सालों तक ललन सिंह का नीतीश कुमार के साथ कोई मुलाक़ात नहीं हुआ। ललन सिंह ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद से तो इस्तीफ़ा दिया था लेकिन पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा नहीं दिया था क्यूँकि ललन सिंह को भी मालूम था कि अगर वो पार्टी से इस्तीफ़ा देंगे तो दल बदल क़ानून के तहत उनकी संसद की सदस्यता भी ख़त्म हो जाएगी। ललन सिंह JDU के टिकट पर एक साल पहले ही साल 2009 में मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने थे।

लेकिन JDU में रहने के बवाजदू ललन सिंह लगातार पार्टी विरोधी काम कर रहे थे, कभी नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ बयान दे रहे थे, कभी नीतीश कुमार के पेट का दाँत ग़िन रहे थे, और कांग्रेस से करीबी बढ़ा रहे थे और घूम-घूमकर भूमिहारों को नीतीश कुमार और JDU के ख़िलाफ़ भड़का रहे थे, भूमिहारों का नेता बनने का प्रयास कर रहे थे। 

2 मई 2010 को ललन सिंह के प्रयास से पटना के गांधी मैदान में बिहार के सभी भूमिहारों का जुटान करने का प्रयास किया गया था और इस रैली का नाम दिया गया था किसान महापंचायत रैली। इस रैली में कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह से लेकर सूरजभान सूरजभान सिंह, प्रभुनाथ सिंह, मुन्ना शुक्ला, त्रिशूल सिंह (बरबीघा), राजन तिवारी, सुनील पांडे, सब आए थे। हालाँकि अनंत सिंह इस रैली में नहीं आए थे।

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यही वो रैली है जिसमें ललन सिंह ने बोला था कि “ वो सर्जरी करके नीतीश कुमार के पेट के सब के सब दांत निकाल देंगे।” अपने आप को होमेओपैथी का डॉक्टर और नीरज कुमार को अल्लोपैथी का डॉक्टर बोलने वाले ललन सिंह इस बार नीतीश कुमार का अल्लोपैथी सर्जरी करने की धमकी दे रहे थे। आप खुद सुन लीजिए: 

पटना गांधी मैदान का वो किसान महापंचायत रैली उम्मीद के अनुसार नहीं रही, बिहार के भूमिहार ललन सिंह को अपना नेता मानने को तैयार नहीं थे, कुछ लोगों का तो ये भी कहना है कि भूमिहारों की इस किसान महापंचायत रैली के लिए किए गए जनसम्पर्क के दौरान ललन सिंह का कई जगहों पर भूमिहारों ने विरोध भी किया था। इसके बाद जब अक्तूबर-नवम्बर 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो उसमें ललन सिंह ने खुलेआम कांग्रेस का प्रचार किया, और इस दौरान ललन सिंह का कांग्रेस पार्टी में शामिल होने की भी खबर खूब फैली।

ललन सिंह कांग्रेस में शामिल तो नहीं हुए लेकिन 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में लखीसराय विधानसभा क्षेत्र से अपने करीबी राम शंकर शर्मा को कांग्रेस से टिकट दिलवाकर JDU के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़वाया। लेकिन इस चुनाव में राम शंकर शर्मा को मात्र 8% वोट मिले। इस चुनाव में लखीसराय के कांग्रेस कार्यकर्ता भी इस तरह से ललन सिंह के करीबी राम शंकर शर्मा को टिकट मिलने से नाराज़ हुए थे जिससे स्थानिये कांग्रेस कार्यकारनी उथल पुथल मची थी। 

एक तरफ़ ललन सिंह भुमिहार को एकजुट करने में विफल हो गए थे, दूसरी तरफ़ कांग्रेस के कंधे पर बंदूक़ रखकर नीतीश कुमार के ऊपर वार करने का ललन सिंह का प्रयास विफल रहा, और तीसरी तरफ़ 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार महानायक बनकर उभरे। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को आपार सफलता के बाद ललन सिंह क्या, बिहार में किसी भी नेता के लिए नीतीश कुमार को चैलेंज करने की हिम्मत नहीं थी। ललन सिंह हार मान चुके थे। सम्भवतः यही कारण है कि नवम्बर 2010 से लेकर मई 2013 तक ललन सिंह ने नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोला।

डोसा पर दोस्ती:

दूसरी तरफ़ नीतीश कुमार ने भी ललन सिंह को पार्टी के ख़िलाफ़ काम करने के लिए कभी JDU से निष्कासित नहीं किया।  दोस्ती दोस्ती होती है।  और ये दोस्ती तो साल 1986 से चल रही थी। वैसे JDU में इसी तरह का एक और केस है जिसमें पार्टी विरोधी काम करने के बावजूद उस नेता को पार्टी से बाहर नहीं निकाला गया था और वो हैं हरिवंश नारायण सिंह और ऐसे ही हैं भाजपा नेता सभ्रमण्यम स्वामी जो भाजपा में रहते हुए भी भाजपा से लेकर मोदी को उल्टा पूलटा सुनाते रहते हैं। लेकिन यहाँ अपने आप को सीमित रखते हैं ललन सिंह तक और अब चलते हैं मई 2013।

तारीख़ थी 20 या 21 मई, समय था शाम के 6-7 बजे, जगह था पटना के फ़्रेज़र रोड में डाक बंगला के पास बंशी विहार रेस्टोरेंट। बंशी विहार का डोसा नीतीश कुमार का फ़ेवरेट फ़ूड है। कहते हैं कि नीतीश कुमार जब भी ज़्यादा खुश होते हैं तो यहीं का डोसा खाते हैं। 20 या 21 मई 2013 को भी नीतीश कुमार बंशी विहार रेस्टोरेंट आए डोसा खाने। लेकिन इस बार नीतीश कुमार खुश नहीं थे। बिहार में NDA टूटने की कगार पर थी क्यूँकि भाजपा नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव का प्रधानमंत्री चेहरा बना रही थी और नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

रेस्टोरेंट में ललन सिंह पहले से ही मौजूद थे, इस बार डोसा ललन सिंह के साथ खाया गया और डोसा ने ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच फिर से सुलह करवा दिया। इस सुलह के पीछे थे डब्लू सिंह उर्फ़ वेंकटेश कुमार थे, डब्लू सिंह पटना के ही व्यवसायी थे, नया नया राजनीति में रुचि आया था तो ललन सिंह से करीबी बढ़ाने के प्रयास में नीतीश कुमार के साथ ललन सिंह का सुलह कराने में अहम भूमिका निभाए।

इस दोस्ती की पहल नीतीश कुमार की तरफ़ से नहीं बल्कि ललन सिंह की तरफ़ से हुई थी। ललन सिंह अब और कर भी क्या सकते थे 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार की जो विराट छवि बनी थी उसके बाद नीतीश कुमार के साथ दोस्ती करने के अलावा उनके पास और उपाय भी क्या था? उसके ऊपर से उनका भूमिहार किसान महापंचायत भी फेल हो गया था, कोंग्रेस से भी कुछ ख़ास नहीं मिला था। 

नीरज कुमार और ललन सिंह:

एक साल के भीतर समय आया डब्लू सिंह को नीतीश कुमार और ललन सिंह के बीच फिर से दोस्ती करवाने का इनाम देने का। दो दोस्तों को मिलाने का इनाम। और यहीं आता है कहानी में एक ट्विस्ट। अप्रैल-मई 2014 में लोकसभा चुनाव होने से पहले फ़रवरी 2014 में बिहार में MLC चुनाव होना था। पटना स्नातक क्षेत्र से JDU से प्रवक्ता नीरज कुमार सिटिंग MLC थे, ललन सिंह और नीतीश कुमार के मनमुटाव के दिनों में ललन सिंह द्वारा नीतीश कुमार पर किए जा रहे हर आरोप और कटाक्ष का जवाब यही नीरज कुमार दे रहे थे और ललन सिंह पर आक्रामक थे।

नीतीश कुमार के क़रीब आने के बाद ललन बाबू ने सबसे पहले नीरज कुमार का पत्ता काटने का प्रयास किया। ललन बाबू ने डब्लू सिंह को पटना स्नातक MLC का JDU से टिकट देने का पूरा प्रयास किया, लेकिन टिकट अंततः सिटिंग MLC नीरज कुमार को ही मिला, जब टिकट नहीं मिला तो डब्लू सिंह निर्दलीय चुनाव लड़े जिसमें डब्लू सिंह को ललन सिंह का साथ भी मिला, दूसरी तरफ़ RJD के जो कैंडिडट थे आज़ाद गांधी वो भी ललन सिंह के करीबी थे।

मिला जुलाकर इस MLC चुनाव में ललन सिंह ने नीरज कुमार को ठिकाने लगाने का हर सम्भव प्रयास किया लेकिन उन्हें हराने के सभी प्रयासों के बावजूद नीरज कुमार चुनाव जीते और पिछले चुनाव से ज़्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीते। वैसे ये भी जानना ज़रूरी है आपके लिए कि 2008 में जब नीरज कुमार पहली बार MLC का चुनाव लड़ रहे थे तब नीरज कुमार को JDU से टिकट दिलाने वाले भी ललन सिंह ही थे।

आजकल पटना के गलियारों में चर्चा है कि नीरज कुमार और ललन बाबू के बीच रिश्ते खट्टे चल रहे हैं। वैसे जब जब ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच रिश्ते खट्टे होते हैं तब तब नीरज कुमार और ललन सिंह के बीच भी रिश्ते खट्टे हो जाते हैं। अब ये संयोग है या इसके पीछे कोई और कारण है ये तो आप खुद समझिए। फ़िलहाल ललन सिंह और उनकी राजनीति को समझने के लिए थोड़ा और पीछे चलिए।

2004:

साल था 2004, NDA शाइनिंग इंडिया के साथ अटल बिहारी बजपायी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार लोकसभा चुनाव जितने के प्रति बहुत कॉन्फ़िडेंट थी। सबको लग रहा था कि चुनाव में बाजपेयी जी की लगातार तीसरी बार सरकार बनेगी, ललन बाबू को भी यही लग रहा था। उस समय ललन सिंह JDU में थे, राज्य सभा से सांसद भी थे, और उनका राज्यसभा का कार्यकाल 2006 तक था। लेकिन उसके बावजूद वो लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे, बेगुसराय लोकसभा क्षेत्र से। नीतीश जी उन्हें मनाते रहे कि क्या कीजिएगा चुनाव लड़के, राज्य सभा में तो आप है ही, आगे भी भेज देंगे राज्य सभा।

लेकिन ललन बाबू नहीं माने, जॉर्ज साहब से मिले, शरद यादव से मिले और बेगूसराय से अपना टिकट पक्का कर लिया। चुनाव हुआ, और अटल बिहारी हार गए, BJP भी हार गई, NDA भी हार गई, और नीतीश कुमार भी हार गए, लेकिन ललन बाबू जीत गए। 2009 में फिर से NDA हार गई और ललन सिंह फिर से चुनाव जीत गए। इस बार ललन सिंह मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने थे। ललन बाबू की कड़काठी बढ़ रही थी। लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके थे और दोनो बार अलग अलग लोकसभा क्षेत्र से। और उसके ऊपर से वो ये चुनाव तब जीते थे जब दोनो बार इनका गठबंधन NDA दोनो बार चुनाव हार गई थी।

अब ललन बाबू के पर कतरने के दिन आ गए थे। नीतीश कुमार का तो यही स्टाइल है पॉलिटिक्स का, किसी को भी एक सीमा से अधिक ऊपर आने नहीं देते हैं। और ललन सिंह तो घाघ आदमी है, राजनीति हमेशा चढ़ के करते हैं, ईगो के साथ करते हैं, दबंग की तरह करते हैं, कार्यकर्ताओं से लेकर पार्टी को अपनी बपौती समझ के राजनीति करते हैं। उस समय ललन बाबू JDU के प्रदेश अध्यक्ष भी थे। इसलिए ललन सिंह के ऊपर भी नीतीश कुमार की कैंची चल गई।

JDU में ललन बाबू का पर कतरने के लिए नीतीश कुमार ने बंदूक़ रखा RCP सिंह के ऊपर। RCP नीतीश कुमार के करीबी थे और नीतीश कुमार के साथ तब से थे जब नीतीश कुमार केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। RCP रेल मंत्री नीतीश कुमार अप-सचिव थे। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तो ललन सिंह थे लेकिन RCP सिंह ललन बाबू के काम में दख़ल देने लगे, पार्टी का हिसाब किताब रखने का प्रयास करने लगे और फिर उसके बाद जो भी हुआ वो हमने आपको इस विडीओ के शुरू में ही बताया था। ललन बाबू और RCP के बीच खिचा तानी के बीच अंततः ललन सिंह नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिए। 

अब 2023 में फिर से वही माहौल बन रहा है, कभी अशोक चौधरी तो अभी रणवीर नंदन तो कभी किसी और के कंधे पर बंदूक़ रखकर नीतीश कुमार ललन सिंह को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। उधर अफ़वाह तो ये भी है की ललन बाबू नीतीश कुमार को कमजोर करने के लिए लालू यादव के साथ करीबी बढ़ा रहे हैं, ताकि ललन बाबू के साथ फिर से दोबारा वो न हो पाए जो उनके साथ 2009-10 में हुआ था। लेकिन ये सब अफ़वाह ही है, और इन अफ़वाहों से बहुत जल्दी पर्दा उठने वाला है।

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Raavan Kumar
Raavan Kumar
Raavan Kumar is based in Uttarakhand and do business only in writing.
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