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संसद का सबसे बदतमीज़ नेता हुकुम चंद कछवाय: राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के मित्र और जनसंघ के पहले दलित सांसद

हुकुम चंद कछवाय, भारत के इतिहास में लोकसभा से निलम्बित होने वाले पहले सांसद, देश की संसद में भारत को परमाणु बम बनाने का सलाह देने वाले पहले सांसद, अपनी ही पार्टी की सरकार के मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस के ख़िलाफ़ रिस्वत लेने का आरोप लगाने वाले पहला नेता, अपने ही पार्टी के प्रधानमंत्री द्वारा आपराधिक मुक़दमा झेलने वाला पहला और आख़िरी नेता, संजय गांधी को संसद के भीतर पागल बोने वाले नेता, पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के बेहद करीबी, लंगोटिया यार और लगातार चार बार लोकसभा चुनाव जितने के बावजूद मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी टिकट से वंचित होने वाला नेता।

लेकिन इसके बावजूद इनके तेवर ऐसे थे कि सदन से लेकर संसद तक किसी की नहीं सुनते थे। ये सारे गुण क्या एक व्यक्ति में हो सकता है? हो सकता है अगर वो कोई दबंग हो, ठाकुर हो, ज़मींदार हो। लेकिन जिस नेताजी की बात हो रही है वो न दबंग थे, न ठाकुर, न ज़मींदार। वो एक दलित नेता थे, जो मध्य प्रदेश से जनसंघ से निर्वाचित पहले सांसद थे। मज़दूर यूनियन नेता, हिंदुत्व की विचारधारा में विश्वास करने वाले, और समाजवाद पर भाषण देने वाले कुछ विरले नेताओं में से एक हुकुम चंद कछवाय। 

चुनावी सफ़र: मध्यप्रदेश 

हुकुम चंद कछवाय आज़ाद हिंदुस्तान में मध्य प्रदेश से जनसंघ के पहले सांसद थे। साल 1962 में वो देवास लोकसभा सीट से पहली बार जनसंघ के टिकट पर सांसद बने थे। साल 1962 के चुनाव में मध्य प्रदेश से जनसंघ के तीन सांसद निर्वाचित हुए थे और उसमें से हुकुम चंद कछवाय एकलौत दलित सांसद थे।

संसद पहुँचने के बाद संसद के भीतर इन्होंने इतना उत्पात मचाया कि कांग्रेस ने इन्हें अगले चुनाव में यानी कि 1967 के चुनाव में हराने के लिए हार सम्भव प्रयास किया। सबसे पहले कांग्रेस की सरकार ने हुकुम चंद कछवाय की लोकसभा सीट को ही ख़त्म कर दिया। लेकिन तब तक हुकुम चंद कछवाय इतने प्रसिद्ध हो चुके थे कि जब वो 1967 के चुनाव में उज्जैन लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े तो पिछले चुनाव की तुलना में इस बार नौ गुना अधिक वोटों के अंतर से चुनाव जीते।

इसके बाद साल 1971 के लोकसभा चुनाव में मोरेना लोकसभा क्षेत्र में चुनाव लड़ने चले गए और जीत भी गए। 1977 के लोकसभा चुनाव में ये फिर से वापस उज्जैन लोकसभा से चुनाव लड़े और पिछले चुनाव से अधिक वोटों के अंतर से चुनाव जीते। 

1980 के चुनाव में दलित नेता हुकुम चंद कछवाय एक ग़ैर दलित-आरक्षित सीट मतलब अनरक्षित सीट बालाघाट से चुनाव लड़े और हार गए। इसके बाद 1984 के चुनाव में उन्हें भाजपा ने टिकट देने से इंकार कर दिया और वो चुनाव नहीं लड़े। माना जाता है कि हुकुम चंद कछवाय जनता पार्टी के विखंडन और अलग पार्टी भाजपा के गठन से सहमत नहीं थे जिसके कारण भाजपा ने उन्हें धीरे धीरे किनारे लगाने का प्रयास शुरू कर दिया। इसके बाद जब 1989 के चुनाव में भी भाजपा ने इन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं दिया। 

सांसदों के निलम्बन का इतिहास: Nehru से Rahul Gandhi तक | News Hunters |

लोगों का यह भी मानना था कि जनता पार्टी के नेता चंद्रशेखर ने इनका टिकट काट था क्यूँकि हुकुम जी चंद्रशेखर के ऊपर भी अक्सर उल्टा सीधा आरोप लगाते थे। टिकट नहीं मिलने का दूसरा कारण था इनका जनसंघ के साथ घनिष्टता जबकि चंद्रशेखर जनसंघ से दूरी बना रहे थे और 114 लोगों की पहली लिस्ट में जनता पार्टी ने एक भी जनसंघ के व्यक्ति को टिकट नहीं दिया। जनसंघ के बीस सांसदों का टिकट काट दिया जो सिटिंग संसद थे। दरअसल भाजपा पर जनता दल गठबंधन का दबाव था कि संघ से जुड़े लोगों को कम से कम टिकट दिया जाए ताकि जनता दल का धर्म-निरपेक्ष इमेज बनाया जा सके। 

1989 में जब हुकुम चंद कछवाय जी को भाजपा से टिकट नहीं मिला तो वो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में चले गए। अगले ही साल 1990 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन्हें घट्टिया विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़वाया लेकिन इस चुनाव में भी हुकुम चंद कछवाय भाजपा प्रत्याशी रामेश्वर अखंड 7017 वोट से चुनाव हार गए। और फिर इसके बाद हुकुम चंद कछवाय अपने जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं जीत पाए। 

विद्रोही हुकुम चंद कछवाय

इस तरह से जनसंघ के एक धाकड और विद्रोही दलित नेता का राजनीतिक हत्या जनसंघ के रास्ते भाजपा होते हुए कांग्रेस में हुआ। लेकिन हुकुम चंद कछवाय का विद्रोही प्रवृति का इतिहास उतना ही पुराना है जितना उनका राजनीतिक जीवन। ये वही हुकम चंद कचवाई थे जिन्होंने अपनी ही जनता पार्टी सरकार के मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस के ऊपर अप्रैल 1978 में भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया था। जब हुकम चंद कचवाई ने अप्रैल 1978 में जॉर्ज साहब के ऊपर आरोप लगाया तो जनता पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने हुकम चंद कचवाई के ख़िलाफ़ नवम्बर 1978 में आपराधिक मुक़दमा दर्ज कराने का आदेश दे दिया। 

हुकम चंद ने जॉर्ज साहब के ऊपर आरोप लगाया था कि नैशनल टेक्स्टायल कॉर्परेशन (मध्य प्रदेश) के चेर्मन कम मैनेजिंग डिरेक्टर एमपी श्रीवास्तव ने अपने भ्रष्टाचार की फ़ाइल को दबाने के लिए जॉर्ज साहब को प्रति महीने एक लाख रुपए देने का वादा किया था। हुकम चंद ने इन आरोपों को 29 मई को ‘स्वदेश पत्रिका’ और 30 मई को जागरण पत्रिका में छपवा दिया था। उधर श्रीवास्तव ने भी हुकम चंद समेत स्वदेशी पत्रिका, जागरण पत्रिका और दैनिक भास्कर के ऊपर भी इंदौर में मानहानि और आपराधिक केस दर्ज करवा दिया जो कि हुकम चंद कचवाई के ऊपर केंद्र सरकार के द्वारा किए गए  केस से अलग था। 

दरअसल हुकुम जी जॉर्ज फ़र्नांडिस के ख़िलाफ़ हमेशा उल्टा सीधा बोलते रहते थे क्यूँकि जॉर्ज फ़र्नांडिस और हुकुम जी दोनो मज़दूरों के नेता थे और दोनो में बेहतर मज़दूर नेता के लिए प्रतिस्पर्धा रहता था। भारतीय रेल्वे मज़दूर संघ के साथ साथ हकीम जी DMSE संघ के भी नेता थे। इसके अलावा हुकुम जी सेवा दल, RSS, 1952 में गौ-रक्षा आंदोलन में भी हिस्सा ले चुके थे जिसके कारण जनसंघ में उनका विशेष स्थान था।

संसद से निलम्बन:

इसके पहले भी हुकम चंद जी के ख़िलाफ़ संसद के भीतर भी कम्प्लेन किया गया था जिसके एवज़ में उन्हें 13 अप्रैल 1963 को संसद से निलम्बित भी कर दिया गया था। दरअसल लोकसभा बहस के दौरान हुकम बाबू ने प्रधानमंत्री को भी अपशब्द बोला था जिसका मीडिया में कड़ी निंदा की गई थी और जिसके बाद इन्हें निलम्बित कर दिया गया था। भारतीय संसद के इतिहास में यह दूसरा और लोकसभा के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जब संसद में किसी सांसद का निलम्बन हुआ हो। इससे पहले 3 सितम्बर 1962 को राज्य सभा के निर्दलीय सांसद Godey Murahari का निलम्बन हो चुका था। 

मध्यप्रदेश में ही खरगोन के दलित सांसद और हुकुम चंद कछवाय के दोस्त श्री बड़े ने इनके निलम्बन को ख़त्म करने के लिए 1 मई 1963 को संसद में प्रस्ताव भी लाया था। उसके बाद हुकम चंद जी ने लोकसभा स्पीकर से 22 अप्रैल को माफ़ी भी माँगी थी। उससे पहले घटना के तुरंत बाद भी हुकम बाबू सभापति से उनके चेम्बर से जाकर मिले, माफ़ी माँगी, कहा जो भी हुआ गलती से हुआ, उत्तेजना में हो गया, हो सके तो माफ़ कर दीजिएगा। अंततः हुकुम चंद कछवाय जी को माफ़ कर दिया गया और उनकी संसद सदस्यता फिर से बहाल कर दी गई थी। 

इसे भी पढ़े: ‘सांसदों का निलम्बन: नेहरू से मोदी तक कब कितने सांसदों का निलम्बन हुआ ?

30 जुलाई 1969 को हुकम महोदय फिर गर्माए, संसद के प्रश्न काल के दौरान सभापति पर आरोप लगा दिया कि सभापति उनकी पार्टी के लोगों को सवाल पूछने का मौक़ा नहीं दे रहे हैं और कॉम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को दे रहे हैं। इस दौरान उन्होंने सभापति को तानाशाही और कॉम्युनिस्ट से डरने वाला बोल दिया।

जब सभापति ने हुकम जी को ऐसी भाषा के इस्तेमाल करने से माना किया तो रंग जी उनके पक्ष में खड़े हो गए। बार बार मना करने पर भी जब हुकम जी नहीं माने तो उन्हें फिर से सदन से बाहर कर दिया गया। और फिर दिन भर के लिए उन्हें सदन से निलम्बित कर दिया गया। हालाँकि माफ़ी के बाद हुकुम जी का निलम्बन रद्द भी कर दिया गया था।  

लेकिन हुकुम चंद जी का निलम्बन एक के बाद एक जारी रहा। 10 सितम्बर 1966 को इन्हें फिर से निलम्बित किया गया और फिर 25 जुलाई 1966 को, उसके बाद 16 नवम्बर 1966 को और फिर आख़री बार इन्हें 3 मई 1972 को भी इनका निलम्बन किया गया था संसद से। इनकी निडरता का आलम ये था कि 6 अप्रैल 1977 को तो इन्होंने संसद में मीडिया के ऊपर हो रहे एक बहस के दौरान कांग्रेस नेता संजय गांधी को बेहूदा और मूर्ख तक बोल दिया था। हालाँकि उस समय संसद में ही मौजूद बिहार के नेता कर्पूरी ठाकुर ने संसद में किसी भी व्यक्ति के लिए इस तरह के शब्द का इस्तेमाल करने का विरोध किया था।

Hukum Chand Kachwai & Young Ramnath Kovind
चित्र: देश में आपातकाल लागू होने से ठीक कुछ दिन पहले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और हुकुम चंद कछवाय कोली समाज के कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए।

व्यक्तित्व

हुकुम चंद कछवाय के व्यक्तित्व का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से लगाया जा सकता है कि इनकी दोस्ती देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से बहुत गहरी थी ख़ासकर जब हुकुम चंद कछवाय उज्जैन के सांसद हुआ करते थे। कहते हैं कि राष्ट्रपति कोविंद महोदय की शादी भी हुकुम चंद जी ने ही करवाई थी। 

अपने राजनीतिक जीवन में और ख़ासकर मज़दूरों के न्याय की लड़ाई में हुकुम चंद कछवाय जी ने हिंदुस्तान में घरेलू मज़दूरों (डमेस्टिक वर्कर ) को अन्य मज़दूरों की तरह इंडस्ट्रीयल डिस्प्यूट ऐक्ट 1947 के तहत अधिकार दिलवाने के लिए इन्होंने लोकसभा में दो बार बिल पेश किया (1972 और 1977)। इस बिल के तहत इन्होंने मज़दूरों के लिए आठ घंटे का काम, 21 बीमारी की छुट्टी, और 12 कैज़ूअल छुट्टी के भी माँग रखी थी। हुकम जी द्वारा तैयार किए गए इस बिल को संसद में 2009 तक अलग अलग पार्टी के नेताओं द्वारा कई बार पेश किया गया और आज भी यह बिल मज़दूर अधिकार के लिए एक मॉडल की तरह देखा जाता है।

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Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
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