HomePoliticsराष्ट्रगान पर क्यूँ बहस नहीं करना चाहती थी भारतीय संविधान सभा ?

राष्ट्रगान पर क्यूँ बहस नहीं करना चाहती थी भारतीय संविधान सभा ?

संविधान सभा के दौरान राष्ट्रगान का मुद्दा बार बार उठा लेकिन अंततः बिना कोई बहस के इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के द्वारा फ़ैसला ले लिया गया।

वर्ष 1911 में जब पहली बार कांग्रेस के अधिवेशन में ‘जन गण मन’ (राष्ट्रगान) गाया गया तो ब्रिटिश मीडिया ने इस गीत को ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम के सम्मान में गाया गाया गीत के रूप में प्रचारित किया। हालाँकि 1930 के दशक के दौरान इस गीत के रचयिता रविंद्रनाथ टैगोर ने विवाद पर विराम देने के लिए यह स्पष्ट कर चुके थे कि वो कभी भी किसी उपनिवेशी शासक के लिए कोई गीत लिख ही नहीं सकते हैं। इसके बावजूद संविधान सभा में जब राष्ट्रगान का सवाल उठा तो ‘जन गण मन’ पर यह आरोप फिर से लगाया गया। 

दरअसल वर्ष 1911 में ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम भारत की यात्रा पर आए थे। इसी वर्ष ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन के फ़ैसले को रद्द कर दिया था। ब्रिटिश राजा के इस निर्णय के लिए कांग्रेस ने उनका धन्यवाद दिया। उसी वर्ष 26 दिसम्बर को कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में दो गाना गाने का प्रस्ताव था।

इन दो गानो में से एक गाना रामानुज चौधरी द्वारा रचित गीत था जिसे ब्रिटिश सरकार को बंगाल विभाजन रद्द करने के लिए धन्यवाद स्वरूप अधिवेशन के दौरान गाया जाना था। एक अन्य गाना था ‘जन गण मन’ जिसे बंगाली में हिंदुस्तान को एक राष्ट्र के रूप में स्तुति के लिए गाना जाना था। अधिवेशन में यह गाना बंगाली भाषा में गया गया था। 

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चित्र: कांग्रेस के अधिवेशन को सम्बोधित करते पंडित नेहरु।

राष्ट्रगान और टैगोर:

रविंद्र नाथ टैगोर ने ‘जन गण मन’ को मूलतः बंगाली भाषा में लिखा था जिसके बोल थे ‘भारोतो भाग्यो बिधाता’, अर्थात् भारत हमारी भाग्य विधाता है। जब फ़रवरी 1919 में इस गीत का अंग्रेज़ी अनुवाद किया गया तो इसका शीर्षक रखा गया, “द मोर्निंग सोंग ओफ़ इंडिया’। इसी तरह कैप्टन आबिद हसन सफ़रनी ने इसका हिंदुस्तानी अनुवाद भी किया जिसका शीर्षक दिया ‘शुभ सुख चैन’। इन उपरोक्त किसी भी अनुवाद के शीर्षक के आधार पर यह कहीं से भी प्रतीत नहीं होता है कि इस गीत को किसी राजा या व्यक्ति विशेष के लिए लिखा गया हो। 

ऐसा नहीं है कि रविंद्र नाथ टैगोर को कभी हिंदुस्तान में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा में गीत लिखने का आग्रह नहीं किया गया था लेकिन ऐसे प्रस्ताव को रविंद्र नाथ यह कहकर ठुकराते रहे कि ऐसे किसी प्रस्ताव का जवाब देना भी वो अपनी खुद की इज्जत नीलाम करने के तुल्य समझते हैं। अपने एक मित्र पुलिन बिहारी सेन को लिखे एक पत्र में टैगोर ने लिखा है कि उन्होंने ‘जन गण मन’ में हिंदुस्तान को भाग्य विधाता बताया है। 

इस गीत को इतिहास में पहली बार राष्ट्रगान के रूप में घोषणा नेताजी सुभाष चंद्रा बोस ने अपनी जर्मानी यात्रा के दौरान 11 सितम्बर 1942 को जर्मन-इंडीयन सॉसायटी के एक कार्यक्रम में किया था। गांधी जी ने इस गीत को हिंदुस्तान के राष्ट्रीय जीवन का अहम हिस्सा बताया था। लेकिन संविधान निर्माण के दौरान हिंदुवादी लोग और संगठने ‘जन गण मन’ की जगह बंकिम चंद्र चटोपाध्याय द्वारा लिखित ‘वंदे मातरम’ को हिंदुस्तान का राष्ट्रगान बनाना चाहते थे।

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चित्र: संविधान सभा में बहस।

राष्ट्रगान और संविधान सभा:

मुस्लिम तबका का मानना था कि चुकी ‘वंदे मातरम’ देवी दुर्गा के गुणगान में लिखा गया था इसलिए एक धर्म-निरपेक्ष देश का यह राष्ट्रगान नहीं हो सकता है। भारत सरकार हिंदुस्तान का संविधान तैयार होने से पहले ही तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज और ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान घोषित कर चुके थे।

05 नवम्बर 1948 को सेठ गोविंद दास ने राष्ट्रगान के प्रश्न पर संविधान सभा की चुप्पी पर चिंता जताई। 15 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान घोषित करने के भारत सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ संविधान सभा में संसोधन प्रस्ताव भी पेश किया गया लेकिन मुद्दे पर बहस नहीं हो पाई।

30 जुलाई 1949 को फिर से सेठ गोविंद दास द्वारा इस मुद्दे पर बहस करने के लिए तिथि निर्धारित करने की असफल माँग की गई। संविधान सभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज का सवाल सर्वप्रथम सरोजनी नायडू ने 22 जुलाई 1947 में ही उठा चुकी थी और इसके बाद राष्ट्रगान का मुद्दा संविधान सभा में कई बार उठा। (26 अगस्त 1947, 06 नवम्बर 1948, 9 नवम्बर 1948, 24 नवम्बर 1949, )

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राष्ट्रीय ध्वज का मामला आसानी से पारित हो गया लेकिन राष्ट्रगान के मुद्दे पर बहस के लिए राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का कई बार ध्यान आकर्षण करवाना पड़ा। राष्ट्रपति ने इस विषय पर एक विशेष समिती भी बनाने का सुझाव दिया जिसे ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ के परे राष्ट्रगान के लिए एक नया गाना भी बनाने का अधिकार था। लेकिन मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई। 17 नवम्बर और फिर 26 नवम्बर 1949 को आख़री बार संविधान सभा में राष्ट्रगान का मुद्दा श्री बी दास और श्री लक्ष्मीनारायण साहू ने उठाया जिसपर राष्ट्रपति का जवाब टाल-मटोल वाला रहा। 

संविधान सभा के कई सदस्यों का सुझाव था कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय भाषा के प्रश्न पर फ़ैसला लेने का अधिकार संसद को दे दिया जाय और संविधान सभा इस मुद्दे पर कोई हस्तक्षेप नहीं करे। पंडित नेहरु चाहते थे कि राष्ट्रीय ध्वज की तरह राष्ट्रगान के विषय पर भी संविधान सभा ही अंतिम फ़ैसला ले।

अंततः 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति ने मुद्दे पर बिना बहस करवाए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में संवैधानिक घोषणा किया और ‘वंदे मातरम’ समान सम्मान देने का भी अहवाहन किया। हालाँकि इस सम्बंध में भारत सरकार को राष्ट्रगान के कुछ शब्दों में बदलाव करने का भी अधिकार दिया। दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय भाषा का मुद्दा पूरी तरह संसद के ऊपर छोड़ दिया गया।

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