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बिहार विधानसभा सत्रों की घटती संख्या के लिए कौन ज़िम्मेदार : 1952 से 2022 तक

साल 1952 में जब बिहार में पहली निर्वाचित सरकार ने अपना कार्यकाल शुरू किया था तो उस साल बिहार विधानसभा का पहला ही सत्र 85 दिन चला था और उस दौरान कुल 57 बैठक हुई थी, बिहार विधानसभा में। लेकिन इस साल 2023 के बिहार विधानसभा का पहला सत्र मात्र 38 दिन चला और उस 38 दिन के दौरान मात्र 20 बैठकें हुई। इसी तरह से पूरे एक साल के दौरान बिहार विधानसभा में होने वाले तीन सत्रों का समय और बैठकों की संख्या में पिछले सत्तर सालों के दौरान भारी गिरावट देखने को मिली है।

बिहार विधानसभा सत्र की घटती संख्या : श्री बाबु से नितीश कुमार तक | News Hunters |

उदाहरण के लिए साल 1953 के पूरे साल के दौरान बिहार विधानसभा के दो ही सत्र चले थे लेकिन उसके बावजूद दोनो सत्रों की कुल अवधि 146 दिनों की थी और इन 146 दिनों के दौरान बिहार विधानसभा की कुल 90 बैठकें हुई थी। वहीं दूसरी तरफ़ साल 2021 में बिहार विधानसभा मात्र 44 दिन के लिए चला और उन 44 दिनों के दौरान मात्र 32 बैठकें हुई। मतलब साफ़ है कि बिहार के विधानसभा में होने वाली बैठके पिछले सत्तर सालों के दौरान घटी है। दिनों की संख्या भी घटी है और बैठकों की भी संख्या घटी है, जब विधानसभा में विधायक बैठकर काम करते हैं बहस करते हैं, बिहार और बिहारियों का भविष्य तय करते हैं। 

लेकिन सवाल उठता है कि बिहार विधानसभा के नेताजी लोग इतने काहिल और आलसी होने कब से शुरू हुए? किस मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान औसतन सबसे कम बिहार विधानसभा में बैठके हुई है और किस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में सबसे ज़्यादा बैठके हुई है? 

पिछले सत्तर सालों के दौरान अब तक बिहार विधानसभा 5298 दिनों के लिए खुला है। इन 5298 दिनों में बिहार विधानसभा की कुल 3168 बैठके हुई है विधायकों की बैठक हुई है, सदन के भीतर। बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री बाबू के साल 1952 से 1961 तक के 9 सालों के कार्यकाल के दौरान बिहार विधानसभा कुल 1235 दिन काम किया था और उस 1235 दिनों के दौरान बिहार विधानसभा की कुल 756 बैठके हुई थी।

बिहार विधानसभा: श्री बाबू से सुशासन बाबू तक

यानी की श्री बाबू के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान प्रत्येक वर्ष औसतन 137 दिन बिहार विधानसभा चला था और उस दौरान प्रत्येक वर्ष विधानसभा की औसतन 84 बैठके हुई थी जो कि साल 2021 के 44 दिन और 32 बैठकों का लगभग तीन गुना अधिक था। श्री बाबू के नौ सालों की तुलना में नीतीश कुमार के कार्यकाल के पहले नौ सालों के शासन के दौरान मतलब साल 2005 से लेकर 2014 तक बिहार विधानसभा मात्र 455 दिन चला और इन 455 दिनों के दौरान विधानसभा में मात्र 302 बैठकें हुई।

कहाँ श्री बाबू के नौ सालों में 1235 दिन और कहाँ नीतीश कुमार का नौ सालों में 455 दिन, कहाँ श्री बाबू के नौ सालों में विधानसभा की 756 बैठके और कहाँ नीतीश कुमार के विधानसभा में मात्र 302 विधानसभा बैठकें। मतलब इतना तो क्लीर हो गया है कि श्री बाबू की तुलना में नीतीश कुमार अघोर ग़ैर-लोकतांत्रिक मुख्यमंत्री हैं बिहार के। 

बिहार विधानसभा सत्र,
टेबल: बिहार विधानसभा में श्री कृष्ण सिंह, लालू यादव, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान सत्रों और दिनों की संख्या।

अब थोड़ा तुलना कर लेते हैं नीतीश कुमार जी का रबड़ी देवी और लालू यादव के साथ भी। लालू यादव जी पहली बार साल 1990 में मुख्यमंत्री बने थे और 1997 तक सात सालों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इन सात सालों के दौरान बिहार विधानसभा 434 दिनों के लिए खुला और इन 434 दिनों के दौरान 268 विधानसभा की बैठकें हुई थी लालू यादव के कार्यकाल के दौरान मतलब की लालू यादव के कार्यकाल के दौरान प्रतिवर्ष बिहार विधानसभा 62 दिनों के लिए खुला था और उन बासठ दिनों के दौरान औसतन प्रत्येक वर्ष 38 विधानसभा की बैठके हुई थी।

दूसरी तरफ़ नीतीश कुमार जी के पहले सात सालों के कार्यकाल के दौरान मतलब साल 2005 से 2012 के दौरान 383 दिन के लिए बिहार विधानसभा चला था और उस 383 दिनों के दौरान मात्रा 254 विधानसभा की बैठकें हुई थी जो कि लालू यादव के शासनकाल के दौरान 434 दिन के दौरान 268 विधानसभा की बैठकों से कम है। यानी की नीतीश कुमार का विधानसभा चलाने में पर्फ़ॉर्मन्स सिर्फ श्री बाबू की तुलना में ख़राब नहीं है बल्कि लालू यादव की भी तुलना में ख़राब ही है। मतलब कम से कम विधानसभा के संचालन के मामले में तो लालू यादव नीतीश कुमार से बेहतर निकले।

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राबड़ी देवी के सात सालों के कार्यकाल के दौरान बिहार विधानसभा कुल 312 दिन चला था और उन 312 दिनों के दौरान 225 बैठकें हुई थी। यानी कि बिहार विधानसभा के संचालन के मामले में सबसे ऊपर श्री बाबू हुए, उसके बाद लालू यादव, उसके बाद नीतीश कुमार और सबसे नीचे राबड़ी देवी। इन चार मुख्यमंत्रियों के अलावा बिहार में कोई भी और मुख्यमंत्री नहीं हुआ है पिछले सत्तर सालों के दौरान जिसने कम से कम पाँच साल बिहार का मुख्यमंत्री पद का सम्भाला हो।

कम समय के लिए बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठने वाले मुख्यमंत्रियों में से एक प्रमुख नाम था, कर्पूरी ठाकुर। कर्पूरी ठाकुर के ढाई वर्षों के कार्यकाल के दौरान कुल 185 दिनों के लिए बिहार विधानसभा चली और उन 185 दिनों के दौरान विधानसभा की कुल 121 बैठकें हुई थी। औसत रूप से देखें तो कर्पूरी ठाकुर का औसत श्री बाबू के बाद सबसे बढ़ियाँ है। श्री बाबू के कार्यकाल के दौरान औसत रूप से बिहार विधानसभा प्रतिवर्ष 137 दिन चलता था और उस दौरान औसत रूप से प्रति वर्ष 84 विधानसभा बैठक होती थी।

इसके बाद कर्पूरी ठाकुर जी के कार्यकाल के दौरान यह औसत घटकर 74  दिन और 49 बैठक तक सिमट गई और उसके बाद लालू यादव के कार्यकाल के दौरान यह औसत 62 दिन और 38 बैठक तक सिमटी और फिर राबड़ी देवी के कार्यकाल के दौरान औसत 45 दिन और 32 बैठक तक। हालाँकि नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान ये औसत थोड़ी सी बढ़ी लेकिन आज भी यह औसत लालू यादव के कार्यकाल के दौरान औसत से कम 56 दिन और 34 बैठक ही रही। एक साल पहले 2021 में तो यह औसत राबड़ी देवी के कार्यकाल से भी नीचे चला गया।

साल 2021 में बिहार विधानसभा मात्र 44 दिन के लिए चला और उन 44 दिनों के दौरान मात्र 32 बैठकें हुई जबकि राबड़ी देवी के कार्यकाल का औसत 45 दिन और 32 बैठक थी। विकास सिर्फ़ सड़क से तय नहीं होती है विकास सदन से भी तय होती है। इसलिए ढूँढते रहिए, खोजते रहिए।

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Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
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