‘चिपको’ की धरती पर क्यूँ हुआ था ‘पेड़ काटो आंदोलन

'चिपको की धरती' पहाड़ के स्थानीय लोग क्यूँ काटना चाहते थे पेड़ों को? कौन और क्यूँ रोकता था उन्हें पेड़ काँटने से ? कौन थे वो लोग जिन्होंने पेड़ों को काटने के लिए आंदोलन किया?

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पेड़ बचाने के लिए ‘चिपको आंदोलन’ के बारे में तो खूब सुना होगा आपने। पर क्या पेड़ काटने के लिए उत्तराखंड में होने वाले आंदोलनो के बारे में सुना है? उत्तराखंड के पिछले सौ वर्ष के इतिहास में अपने हक़-हकुक की रक्षा करने के लिए स्थानीय लोगों ने पेड़ों को बचाया भी है और नष्ट भी किया है। 

वर्ष 1988 -1989  के दौरान उत्तराखंड के कई भागों में उत्तराखंड क्रांति दल और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी आदि कई संगठनों द्वारा स्थानीय लोगों द्वारा पेड़ काटने के अधिकार के लिए पूरे प्रदेश में लगभग 111 जगहों पर ‘पेड़ काटो आंदोलन’ चलाया गया। इस आंदोलन में उत्तराखंड क्रांति दल के नेता काशी सिंह एरी ने अहम भूमिका निभाई थी। (स्त्रोत)

“उत्तराखंड बनने से पहले ही चिपको आंदोलन की धरती पर सौ से अधिक पेड़ काटो आंदोलन हो चुके थे”

पेड़ काटो आंदोलन में शामिल आंदोलनकारियों का मानना था कि चिपको आंदोलन के बाद आए नए वन क़ानून के लागू होने के कारण वन क्षेत्रों में पेड़ों को काटने पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया गया था। चिपको आंदोलन के बाद यहाँ तक कि स्थानीय लोगों को भी अपनी ज़रूरत के लिए भी वन-संपदाओं का संरक्षित रूप से दोहन करने से रोका जा रहा था। इसके साथ-साथ क्षेत्र में सड़क, विध्यालय, हॉस्पिटल आदि बनाने सम्बन्धी कई विकास की योजनाओं को प्रारम्भ करने में पेड़ काटने की अनुमति नहीं मिलने से अड़चन आ रही थी।

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कई लोगों का तो ये भी मानना है कि चिपको आंदोलन के बाद हुए क़ानूनी बदलाओ से महिलाओं का सशक्तिकरण के विपरीत उनका असशक्तिकरण हुआ। इस मत के अनुसार चिपको आंदोलन से पूर्व स्थानीय महिलाओं को अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वन सम्पदा का सीमित रूप से दोहन करने का अधिकार था। (स्त्रोत) हालाँकि जाने माने इतिहासकार और पद्म-विभूषण से सम्मानित पर्यावरणविद् शेखर पाठक का मानना है कि ‘पेड़ काटो आंदोलन’ एक चिपको की राह से भटका हुआ आंदोलन था।

उत्तराखंड में वर्ष 1921 में ही ‘पेड़ काटो आंदोलन’ जैसी घटना घट चुकी थी। वर्ष 1921 में कुमाऊँ में अल्मोड़ा ज़िले के सोमेश्वर क्षेत्र में चनोदा गाँव की महिलाओं ने अंग्रेज़ी वन क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन किया और थगलोडी जंगल में आग लगा दी। स्थानीय लोगों का कहना था कि नए वन-क़ानून के द्वारा स्थानीय लोगों को वन-सम्पदा जैसे घास, लकड़ी, आदि का इस्तेमाल करने से जबरन रोका जा रहा था। इस आंदोलन के दौरान स्थानीय महिला दुर्गा देवी और बिशन देवी शाह को गिरफ्तार भी किया गया। 

चिपको की धरती रैणी गाँव
रैनी गाँव, चमोली, उत्तराखण्ड

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हाल ही में अल्मोडा ज़िले के रानीखेत तहसील के मजखाली क्षेत्र में बंदरों के आतंक से परेशान और हताश स्थानीय ग्रामीण कृषक परिवारों ने प्रशासन को गांव के आस-पास बंदरों के छिपने वाले पेड़ों को काट डालने की चेतावनी देने के साथ प्रधानमंत्री को भी पत्र भेजकर बंदरों की समस्या से निजात दिलाने की गुहार लगाई है। कुछ दिन पहले जुलाई 2021 में ऐसे ही टेहरी ज़िले के एक गाँव में सड़क निर्माण में आड़े आ रहे पेड़ की कटाई के मामले में वन विभाग से वर्षों से क्लीरन्स नहीं मिलने से परेशान ग्रामीणों ने समग्र रूप से कई पेड़ काट दिए। 

स्त्रोत: 

१. सावित्री कैरा, (१९८९) “कुमाऊँ की महिलाओं का राष्ट्र संग्राम तथा स्थानीय जन आंदोलनो में योगदान”, अप्रकाशित पी॰एच॰डी॰ शोध, इतिहास विभाग, कुमाऊँ विश्व विध्यालय, नैनीताल।

2. मधु सरीन, “डिसेंपोवेरमेंट इन द नेम ओफ़ ‘पर्टिसिपटॉरी’ फ़ॉरेस्ट्री? –  विलेज फ़ॉरेस्ट जवाइंट मैनज्मेंट इन उत्तराखंड”, फ़ॉरेस्ट, ट्रीज़ एंड पीपल, संख्या 44, एप्रिल 2001.3. अजय सिंह रावत (1999), “फ़ॉरेस्ट मैनज्मेंट इन कुमाऊँ हिमालय: स्ट्रगल ओफ़ द मार्जिनलायज़्ड पीपल”, इंडस पब्लिशिंग कम्पनी, न्यू दिल्ली, पृष्ठ संख्या 176-77

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  1. […] बेहतर होता कि लेखक ‘पृथक राज्य आन्दोलन’ और उसकी समीक्षा के साथ इस पुस्तक को ख़त्म करते। हिंदुस्तान का एक-मात्र राज्य जिसकी स्थापना पहाड़ी और हिमालयी पहचान के साथ हुई उसे किताब से परे रखकर कैसे कोई ‘दास्तान ए हिमालय’ सुने या सुनाए। हिमालयी पहचान के साथ बनाई गई उत्तराखंड में हिमालय/पहाड़ आज ख़ाली हो रहा है, हिमालय भूतिया हो रहा है। प्रदेश का दस प्रतिशत से अधिक हिमालयी गाँव पूरी तरह से ख़ाली (भूतिया) हो चुका है। इसी तरह के कई अन्य मुद्दों पर किताब सफ़ाई से बचकर निकलने का प्रयास करता है जैसे ‘पेड़ काटो आंदोलन‘। […]

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