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बिहार Caste Census 2022 बनाम Socio-Economic Caste Census 2011

मुझे इस बात में कोई संशय नहीं था कि बिहार में जातिगत जनगणना (Caste Census) हो पाएगी या नहीं। और मैंने ये बात news 18 पर एक कार्यक्रम में भी बोला था कि मुझे इस बात पर कोई शंका पिछले एक डेढ़ सालों से नहीं था कि बिहार में Caste Census होगी। बस शंका यह थी कि क्या ये रिपोर्ट सार्वजनिक हो पाएगी? और अगर सार्वजनिक हो जाती है तो फिर इस रिपोर्ट के आधार पर जब बिहार सरकार नीतिगत सरकारी फ़ैसले लेना शुरू करेगी, योजनाएँ बनाना शुरू करेगी, नीति निर्धारित करना शुरू करेगी तब जो संवैधानिक अड़चन शुरू होगी उससे बिहार सरकार कैसे निपटेगी।

जब यह Caste Census होने लगेगी तो विरोध करने वाले न्यायालय जाएँगे, अड़चन पैदा होगी, लेकिन अगर राज्य सरकार स्मार्ट तरीक़े से चीजों को हैंडल करेगी तो Caste Census पूरा करना कोई बड़ी बात नहीं थी। अभी तक पिछले एक साल के दौरान, बिहार सरकार Caste Census करवाने और उसे सार्वजनिक करने में पैदा की गई संवैधानिक अड़चनों से बखूबी लड़ा है और उम्मीद है आगे भी लड़ेगा। 

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इस रिपोर्ट में सिर्फ़ राज्य स्तर के आँकडें हैं। और वो भी सिर्फ़ ये की राज्य में किस जाति की कितनी संख्या है, इस रिपोर्ट में ये कहीं नहीं लिखा है कि किस जाति का क्या सामाजिक आर्थिक स्थिति है। यानी की कौन सी जाती कितना गरीब है, कौन कितना आमिर है, कौन सी जाती कितना शिक्षित है कौन सी जाती कितना अशिक्षित है आदि आदि।

कैसे जारी होती है जनगणना रिपोर्ट:

किसी भी जनगणना की रिपोर्ट एक बार में जारी नहीं होती है। उदाहरण के लिए पिछली बार जब साल 2011 में भारतीय जनगणना हुई थी तब जनगणना की रिपोर्ट साल 2015 तक जारी होते रही थी। सभी जनगणना की रिपोर्ट कई फेजों में जारी होती है। उदाहरण के लिए ज़िला स्तर पर जारी होने वाली 2011 की जनगणना डिस्ट्रिक्ट हैंड्बुक साल 2014 में जारी हुई थी जब मोदी सरकार सत्ता में आ चुकी थी।

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आप हिंदुस्तान के किसी भी ज़िले का भारतीय जनगणना 2011 का डिस्ट्रिक्ट रिपोर्ट देख लीजिए उसमें रिपोर्ट के रिलीज़ होने की तिथि जून 2014 से पहले नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए ये पूर्णियाँ ज़िले का जनगणना 2011 डिस्ट्रिक्ट हैंड्बुक है जिसके रिलीज़ होने की तिथि 16 जून 2014 है।

इसी तरह ये दूसरी रिपोर्ट केरल का त्रिवल्लूर ज़िले का जनगणना 2011 डिस्ट्रिक्ट हैंड्बुक रिपोर्ट है और इसका भी जारी होने का तिथि 16 जून 2014 ही है। ऐसे ही गाँव के स्तर तक भारतीय जनगणना की सामाजिक, आर्थिक, लिंग के आधार पर, धर्म के आधार पर, भाषा के आधार पर अलग अलग रिपोर्ट जारी होती है और ये सिलसिला सालों तक चलता है। 

Caste Census रिपोर्ट:

इसलिए बिहार में हुई Caste Census की अलग अलग डिटेल्ड रिपोर्ट समय के साथ जारी हो सकती है और पूरी रिपोर्ट जारी होने में 2-3 साल का समय लग सकता है। भारत सरकार द्वारा साल 2011 में करवाए गए Socio-Economic Caste Census की रिपोर्ट जिस कारण से आज तक जारी नहीं की गई है उसके पीछे भी यही कारण दिया जाता है कि जनगणना के दौरान एकत्रित किए गए आँकड़ों का शुद्धीकरण सही ढंग से पूरा नहीं हो पाया है।

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कर्नाटक में हुए जातिगत जनगणना की भी जो रिपोर्ट आज तक जारी नहीं हुई है उसके पीछे भी यही कारण दिया गया है कि डेटा का शुद्धीकरण नहीं किया जा सका था, फ़िल्टर नहीं किया जा सका था, उसमें त्रुटियाँ नहीं कम किया जा सका था। और ये सब का ज़िक्र आपको मेरी इस किताब में मिल जाएगी कि कैसे भारत सरकार और कर्नाटक सरकार द्वारा Caste Census जारी नहीं करने के पीछे दिए गए ये सभी कारण सिर्फ़ बहाना है। केंद्र सरकार और कर्नाटक सरकार को जातिगत जनगणना का रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने का मन था इसलिए शुद्धीकरण का बहाना बनया गया, बिहार सरकार को रिपोर्ट जारी करना था इसलिए कोई बहाना नहीं बना। 

लेकिन एक परिस्थिति में बिहार सरकार इस जातीय गणना के विस्तृत आँकड़े को नहीं भी जारी कर सकती है। अगर बिहार सरकार ने यह गणना Collection of Statistics Act 2008 के तहत किया है तो फिर इस क़ानून के अनुसार राज्य सरकार किसी भी तरह के गणना के आँकड़े सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है।

लेकिन नीतीश सरकार के लिए ये मुद्दा अब सिर्फ़ संवैधानिक बाध्यता तक सीमित नहीं रहा है, ये मुद्दा संवैधानिक से अधिक राजनीतिक और नैतिक अधिक हो गया है। जैसा कि रिपोर्ट में भी लिखा हुआ है कि सरकार ने ज़िला स्तर तक सारा डेटा इकट्ठा कर लिया है लेकिन वो आँकड़े पूर्णरूपेन गोपनिए है। यानी कि बिहार सरकार इन निजी आँकड़ों को सार्वजनिक नहीं भी कर सकती है। और इस रिपोर्ट में एक और शब्द का इस्तेमाल किया गया है, इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि ये गणना सवेक्षिक भागेदारी से हुई थी इसलिए आम लोगों को ये हक़ नहीं है कि वो गणना के आँकड़े को सार्वजनिक करने की माँग कर सके।

बिहार Caste Census के आँकड़े कितने भ्रामक:

दरअसल बिहार सरकार हो सकता है कि ये डिटेल्ड आँकड़े सार्वजनिक नहीं करे, क्यूँकि इन डिटेल्ड आँकड़ों में बहुत सारे आँकड़े सार्वजनिक होने से लोगों के निजिता के अधिकार का हनन हो सकता है, और इसी निजिता के अधिकार के सवाल पर लोग बिहार के इस जातीय गणना के ख़िलाफ़ न्यायालय गए थे।

पटना उच्च न्यायालय गए थे सर्वोच्च न्यायालय गए थे। Collection of Statistics Act 2008 के तहत राज्य सरकार जातीय गणना या किसी तरह का अन्य गणना कर सकती है जिसमें लोगों से निजी सवाल पूछे जा सकते हैं लेकिन वो गणना सवेक्षिक होना चाहिए और राज्य सरकार उस डेटा को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है। अब ये तो समय ही बताएगा कि बिहार सरकार जातिगत जनगणना के पूरे डिटेल्ड आँकड़े कब जारी करती है या जारी करती भी है या नहीं करती है , लेकिन विपक्ष में बैठी भाजपा तो सवाल करेगी ही। 

जातीय गणना बनाम जातिगत जनगणना:

आप या भाजपा ये सवाल उठा सकती हैं कि 2011 में Socio-Economic Caste Census हुई थी और बिहार में जातीय गणना हुई थी इसलिए बिहार की जातीय गणना की रिपोर्ट जारी हो गई लेकिन चुकी केंद्र सरकार ने जो 2011 में Socio-Economic Caste Census किया था वो जनगणना थी इसलिए उसका रिपोर्ट जारी नहीं हो पाया।

भारत सरकार द्वारा करवाई गई Socio-Economic Caste Census 2011 और बिहार सरकार द्वारा करवाई गई जातीय गणना 2022 में इतना अंतर तो ज़रूर है कि वो केंद्र सरकार द्वारा कराई गई थी और ये राज्य सरकार द्वारा करवाई गई है, उसकी रिपोर्ट पिछले 12 सालों में सार्वजनिक नहीं हो पायी है और इसकी रिपोर्ट को जारी होने में 12 महीने भी नहीं लगे। एक और महत्वपूर्ण अंतर है।

भारत सरकार द्वारा करवाई गई Socio-Economic Caste Census 2011 में जनगणना के दौरान जो लोगों से सवाल पूछे गए थे और जो सवाल बिहार में जातीय गणना 2022 के दौरान पूछे गए थे उसमें कुछ मामूली अंतर है। उदाहरण के लिए भारत सारकर ने लोगों से सवाल पूछा था कि क्या आपके घर में मोबाइल या फ़ोन है या नहीं और बिहार सरकार ने पूछा क्या आपके घर में लैप्टॉप या कम्प्यूटर है या नहीं।

बिहार जातिगत जनगणना ने इन अफ़वाहों, सिद्धांतो, अंतःविरोधों और पूर्वाग्रहों को तोड़ा |

वैसे भी 2011 में ये सवाल हो सकता था कि आपके पास मोबाइल है या नहीं लेकिन 2022 में किसके पास मोबाइल नहीं है, ये सवाल कोई क्यूँ ही पूछेगा, इसी तरह भारत सरकार ने 2011 में सबसे सवाल पूछा था कि आपके पास किसान क्रेडिट कार्ड है या नहीं लेकिन 2022 में ये सवाल बिहार सरकार ने नहीं पूछा। इस तरह के छोटे मोटे अंतर हैं दोनो में। 

लेकिन भाजपा या भारत सरकार ऐसा नहीं बोल सकती है कि भारत सरकार द्वारा साल 2011 में करवाई गई Socio-Economic Caste Census और बिहार सरकार द्वारा करवाई गई जातीय गणना में अंतर है क्यूँकि बिहार की जातीय गणना के ख़िलाफ़ जब सर्वोच्च न्यायालय में केस चल रहा था, सुनवाई हो रही थी तब भारत के अट्टोरनी जेनरल ने यही दलील दिया था कि चुकी बिहार सरकार को किसी तरह का Caste Census करवाने का अधिकार नहीं है इसलिए अगर बिहार में किसी भी तरह की Caste Census हो रही है तो उसे रोका जाए, याचिकाकर्ता भी यही दलील दे रहे थे सर्वोच्च न्यायालय में, और याचिकाकर्ताओं का भाजपा के साथ गहरे सम्बंध थे इसमें भी कोई शक नहीं होना चाहिए.

फ़िलहाल अब अगले कुछ दिनों तक तो मीडिया में यही होगा कि बिहार में हुई Caste Census पर सत्ता पक्ष क्रेडिट लेगा और विपक्ष उसमें ख़ामियाँ निकालेगा। लेकिन एक आम बिहारी के लिए अब सवाल उठता है, कि अब आगे क्या? अब आगे क्या होगा? अब आगे क्या होगा ये तो सरकार तय करेगी, राज्य सरकार तय करेगी, नीतीश सरकार तय करेगी, लेकिन नीतीश सरकार के भी हाथ में सब कुछ नहीं है।

जब बिहार में जातीय गणना हो रही थी तब भी लोगों ने बिहार सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ न्यायालय में याचिका दायर की थी और अब जब इस जातीय गणना के रिपोर्ट के आधार पर बिहार सरकार कोई नीतिगत फ़ैसला लेगी तब भी लोग न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाएँगे क्यूँकि हिंदुस्तान में राज्य सरकारों को किसी भी तरह का Caste Census करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है और गणना के आधार पर लिए गए किसी भी फ़ैसले को कभी भी कहीं भी चैलेंज किया जा सकता है, चुनौती दिया जा सकता है और न्यायालय उसपर उचित कार्यवाही भी कर सकती है। और ये सब भी आपको मेरी किताब में मिल जाएगी।

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Raavan Kumar
Raavan Kumar
Raavan Kumar is based in Uttarakhand and do business only in writing.
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