HomePoliticsसाइकिल, नोवेल पुरस्कार और महिला सशक्तिकरण

साइकिल, नोवेल पुरस्कार और महिला सशक्तिकरण

एक अध्ययन में, नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो, ने दिखाया कि वे लड़कियां जिनको साइकिल दी गई उनकी स्कूल में उपस्थिति और शिक्षा पूरी करने की संभावना बढ़ जाती है। बिहार में किए गए एक अन्य अध्ययन के अनुसार साइकिल रखने वाली लड़कियों का बारहवीं कंप्लीट करने की संभावना बिना साइकिल वाली लड़कियों की अपेक्षा 30 प्रतिशत अधिक होती है।

साइकिल

साइकिल और पश्चिम:

उन्नीसवीं सदी की अमेरिकी महिला मताधिकार आंदोलन की प्रमुख नेत्री सूज़न एंथॉनी का मानना है, “महिला-मुक्ति में साइकिल की, किसी अन्य वस्तु मुक़ाबले, बहुत ही अहम भूमिका रही है।” इंग्लैंड के Leicester शहर में वर्ष 1911 के दौरान महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली Alic Hawkins ने पूरे शहर में साइकिल चलाकर महिला अधिकारों के लिए सांकेतिक प्रचार किया। इस घटना के बाद न सिर्फ़ पूरे इंग्लंड बल्कि पूरे यूरोप और पश्चिम के अन्य देशों में साइकिल महिला उत्थान की पहचान बनकर उभरी थी। 

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अमरीकी नागरिक Fanny Bullock Workman और उनके पति William Hunter Workman ने वर्ष 1898-99 के दौरान हिंदुस्तान के कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में हिमालय तक साइकिल से यात्रा की और फिर वहाँ से हिमालय के सहारे, उत्तर-पूर्व होते हुए जावा, सुमत्रा और बाली तक की साइकिल यात्रा की थी। वो महिला अधिकार और महिलाओं को मतदान के अधिकार के लिए पूरा जीवन लड़ते रही। इस दौरान साइकिल महिला फ़ैशन का हिस्सा बन चुका था। इसी 1890 के दशक के दौरान महिला और साइकिल के सम्बंध पर अमेरिका में गाने बनने लगे जिनमे “The Scorcher” और “ What Will the Girls do Next” दो महत्वपूर्ण म्यूज़िक अल्बम थे। 

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उन्निसवी सदी के अंतिम वर्षों तक महिलाओं के कपड़े-लिबास लम्बे, उलझन भरे और साइकिल चलाने के अनुकूल नहीं थे। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में यूरोप में ‘Rational Clothing’ आंदोलन चला जिसमें महिलाओं ने ऐसे कपड़ों को पहनना शुरू किया जिसमें उन्हें नौकरी करने और यात्रा करने में आसानी हो। यही वो दौर था जब महिलाओं के बिच टखने तक का स्कर्ट और पतलून पहनने का प्रचलन बढ़ने लगे। इसी तरह 1920 के दशक के दौरान महिलाओं के बिच छोटे बाल रखने का भी प्रचलन तेज़ी से बढ़ा। 

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हिंदुस्तान:

हिंदुस्तान में भी सायकिल को महिला उत्थान का प्रतीक बनाने का प्रयास वर्ष 1991 में ही तमिलनाडु के पुदुकोटै ज़िले में वहाँ के तत्कालीन ज़िलाधिकारी शीला रानी चुनकठ के द्वारा किया गया। ज़िलाधिकारी ने क्षेत्र के महिलाओं को नई साइकिल ख़रीदने के लिए बैंक से क़र्ज़ दिलवाने का प्रावधान किया। लेकिन राज्य सरकार से उचित सहयोग नहीं मिलने के कारण योजना उनके ज़िले से बाहर सफल नहीं हो पायी। तमिलनाडु के महिलाओं को राज्य सरकार की तरफ़ से सरकारी साइकिल योजना के लिए वर्ष 2018 तक का इंतज़ार करना पड़ा। 

बिहार:

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लेकिन बिहार सरकार ने वर्ष 2006 में ही प्रदेश में हाई स्कूल के विद्यार्थियों के लिए मुफ़्त सायकिल योजना का आग़ाज़ कर दिया। इस साइकिल योजना को उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब, असाम, राजस्थान, उत्तराखंड और ओड़िसा जैसे कई राज्यों ने अपने अपने प्रदेश में लागू करवाया। ब्रिटेन के हाई कमिशनर जेम्स बेवन ने भी इस योजना की तारीफ़ की और नीतीश कुमार को ब्रिटेन आकार बिहार के विकास मॉडल पर बात रखने का न्योता दिया इस विषय पर कई विदेशी विश्वविद्यालयों में विद्दवानो ने शोध भी किया और मॉडल की तारीफ़ की।

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वर्ष 1997-98 के दौरान मध्यामिक शिक्षा में लड़कियों का ड्रॉपआउट दर बिहार में 87.68% था जबकि राजस्थान (89.25) और पश्चिम बंगाल (88.7) में यह दर बिहार से भी अधिक था। वर्ष 2005-06 आते आते बिहार इस मामले में तीसरे स्थान से पिछड़कर पहले स्थान पर आ गया। इस दौरान बिहार मे मध्यामिक शिक्षा में लड़कियों का ड्रॉपआउट दर 85.36% रहा। वर्ष 2006 में बिहार में साइकिल योजना लागू होने के बाद वर्ष 2017-18 में मध्यामिक शिक्षा में लड़कियों का ड्रॉपआउट दर घटकर 30.5% रह गया। 

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