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ससुरा बड़ा पैसे वाला: वो फ़िल्म जिसने भोजपुरी सिनेमा को मेनस्ट्रीम बना दिया था।

साल 2003 में एक फ़िल्म आयी थी, बिहार में आयी थी, एकदम खाँटी भोजपुरी में थी। 2003 से लेकर अब तक हज़ारों भोजपुरी फ़िल्में बनी है लेकिन पैसा कमाने के मामले में इस फ़िल्म का रेकर्ड कोई दूसरी भोजपुरी फ़िल्म नहीं तोड़ पायी है। इस फ़िल्म के सारे हीरो, हीरोईन से लेकर नाचने-गाने वाले और निर्देशक-प्रडूसर सब भोजपुरिया थे। इस फ़िल्म ने एक भोजपुरी स्टार को भी जन्म दिया था जो गाने से लेकर नाचने और ऐक्टिंग से लेकर नेतागीरी सबमें जम के पहलवानी किए हैं अब तक।

सनिमा का नाम था ‘ससुरा बड़ा पैसे वाला’ और अभिनेता का नाम था मनोज तिवारी, जो आजकल अभिनेता के साथ साथ नेता भी बन गए हैं। मात्र तीस लाख में बनी इस “ससुरा बड़ा पैसे वाला’ फ़िल्म ने लगभग 35 करोड़ रुपए कमाए। यानी कि लगभग  120 गुना का प्रोफ़िट। बोलिवूड छोड़िए कोई होलिवूड के फ़िल्म का नाम बता दीजिए जिसने 120 गुना प्रोफ़िट कमाया हो?

ससुरा बड़ा पैसे वाला: वो फ़िल्म जिसने भोजपुरी सिनेमा को मेन्स्ट्रीम बना दिया था |

हाल में ही आयी पठान 225 करोड़ में बनी और एक हज़ार करोड़ कमाई, मतलब कि पूरा प्रोफ़िट लागत का मात्र चार गुना रही। इस फ़िल्म के आस-पास कोई दूसरी फ़िल्म पहुँची तो वो दंगल ही थी जो सत्तर करोड़ रुपए में बनी और लगभग दो हज़ार करोड़ रुपए कमाई। यानी कि लगभग तीस गुना से थोड़ा कम प्रोफ़िट जो कि “ससुरा बड़ा पैसे वाला” के 120 गुना के सामने कुछ भी नहीं है।

हालाँकि दंगल की कुल दो हज़ार करोड़ की कमाई में से पंद्रह सौ करोड़ की कमाई यानी कि तीन चौथाई की कमाई सिर्फ़ विदेशों से हुई, इंडिया से बाहर हुई थी। और “ससुरा बड़ा पैसे वाला” जो भी कमाया इसी देश में कमाया, इस देश से बाहर छोड़िए ये फ़िल्म तो यूपी और बिहार के बाहर भी कुछ ख़ास नहीं कमा पायी थी। भोजपुरी में ही इस फ़िल्म के बराबर कमाई करने वाली एकमात्र फ़िल्म गंगा में अमिताब बच्चन, से लेकर हेमा मालिनी जैसे सारे बड़े बड़े अभिनेता थे। टोटल कमाई में तो इस भोजपुरी फ़िल्म ने अमिताब बच्चन की ब्लैक और पेज थ्री जैसे बोलीवुड फ़िल्मों को भी पीछे छोड़ दिया था। 

उस दौर में यानी की 2003 के दौर में, भोजिवूड का जन्म नहीं अभी हुआ था। अभी भी बिहारी लोग दिलवाले दुल्हनियाँ जैसी फ़िल्में देखते थे, दिल-तोड़ गाना सुनते थे। अल्ताफ़ राजा उनका फ़ेवरेट हुआ करता था और अजय देवगन की तरह जुल्फ़ी कट बाल रखते थे। स्मार्टफ़ोन अभी आया नहीं था। लेकिन CD आ गया था। लोग VCR से शिफ़्ट करके CD की तरफ़ जा रहे थे और बिहार के सिनेमा हॉल में टिकट का दाम दस रुपए से लेकर पचास रुपए तक हुआ करता था।

बिहार के ज़्यादातर सिनेमा हॉल में हिंदी फ़िल्म ही लगती थी फिर चाहे वो दस साल पुरानी फ़िल्म ही क्यूँ न हो या फिर  गुंडा राज जैसी थर्ड ग्रेड की फ़िल्में लगती थी। लेकिन अब भोजीवुड का टाइम आने वाला था। दो-चार साल के भीतर पावन सिंह, कलुआ, निरहुआ, रधेश्यम रसिया सब खेत के आरी पर हल जोतने वालों से लेकर सूरत-हरियाणा के फेक्टरीयों में काम करने वाले मज़दूरों का स्टार बनने वाले थे। एक बार स्मार्ट फ़ोन आने दीजिए फिर देखिएगा, छठ से लेकर भोजपुरी दोनो ग्लोबल होने वाले थे। 

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फ़िल्म की कहानी:

“ससुरा बड़ा पैसे वाला” की कहानी कुछ ऐसी थी। बिहार के एक गाँव में एक पिता-विहीन किसान परिवार था। घर में अनपढ़ लेकिन शादीशुदा बड़ा भाई अपनी पत्नी के साथ “एक चूम्मा देबी सरकार तो खेतवा कैसे कोड़ाई” गाने के साथ मस्त गाँव का सीधा-साधा जीवन जी रहा था। छोटा भाई शहर से पढ़ाई तो करता है लेकिन गाँव में ही आए एक शहरी लड़की के लिए गाना गाता है, “हम हैं गाँव के छोरा तू तो बाड़ू शहरी में” गाता है।

अब तक गाना फ़िल्म की कहानी के साथ एकदम फ़िट बैठ रहा होता है। वैसे इन दोनो के बीच ये प्यार एकतरफ़ा नहीं था, छोरी को भी छोरे से प्यार हो जाता है। बेटी बाप की एकलौति संतान थी तो एक समय के बाद बाप को झुकना भी पड़ता है, शादी होती है लेकिन लड़का को घर-जमाई बनना पड़ता है। गरीब घर का लौंडा बड़े महल में adjust नहीं कर पाता है, बार बार बेज्जत फ़ील करता है और भाग आता है, अपना गाँव। 

अभी तक फ़िल्म एकदम बिहारियों के करेजा के क़रीब से गुजर रहा होता है। उस दौर का बिहारी पैसा कमाने, पढ़ाई करने या कोई और काम करने चाहे घर जितना दूर चला जाए लेकिन होली-छठ में वापस अपना गाँव नहीं आए तो उसके करेजा पर साँप लोटने लगता था। तो फ़िल्म का राजा रानी को छोड़ के वापस अपने गाँव आने लगता है, लेकिन उसी समय रानी को गुंडे उठा के ले जाते हैं और राजा अपनी रानी को बचाने के लिए भागता, गुंडों से लड़ता है। पूरा फैटम-फेटी होता है, हीरो और गुंडा के बीच में।

बम से धुआँ-धुआँ करने वाले अनुराग कश्यप का अभी एंट्री नहीं हुआ था। पूरा फैटम-फेटी हो जाने के बाद एक ही गोली चलती है, हीरो को लगती है, बड़ा पैसा वाले ससुर जी की जान बचाने के चक्कर में, हीरो अब हीरोईन के साथ साथ ससुरा बड़ा पैसे वाला को भी भी इम्प्रेस कर लेता है। एकदम 90 के दशक वाला मेलोंड्रामा था पूरा फ़िल्म। 

बीच-बीच में कुछ गाने ऐसे भी आ जाते थे जो फ़िल्म में फ़िट तो नहीं बैठते थे लेकिन बिहारी जीवन में एकदम फ़िट बैठते थे। जैसे कि “चल गैलु डुमराव बलमुआ” बिहार में पलायन की कहानी को फ़िल्म में ज़बरदस्ती घुसेड़ने का प्रयास करता है तो दूसरी तरफ़ बिहारी गाँव के जीवन में ताड़ी दिखाने के लिए एक स्टेज डान्स करवा दिया जाता है। लेकिन अभी भी अर्चेस्ट्रा बिहार के गाँव तक नहीं पहुँचा था। लेकिन पीछे वाले गेट से घुसने का प्रयास खूब कर रहा था।

अब शादी-महफ़िल में बाईजी या तवायफ़ नचाने की जगह धीरे धीरे अर्चेस्ट्रा की एंट्री होने वाली थी। फ़िल्म का गाना “जबसे चढ़ल बायसाखिया, की राजा चुए लागल” भी अर्चेस्ट्रा पर नाचने-गाने के अनुकूल नहीं था, तो फ़िल्म खुले स्टेज पर गाना गवा दिया जाता है, “जबसे चढ़ल बायसाखिया की राजा चुए लागल” ताड़ी चुए लागल। बिहार में तार के पेड़ से ताड़ी बैसाख के महीने में ही निकलना शुरू होता है और ताड़ी निकालने को यहाँ चुआना बोलते हैं। ताड़ी चुआना। 

लेकिन बिहारी अमीरों का गाना अब इतना सीधा-साधा नहीं बचा था। जब राजा का बारात शहर वाले आमिर शसुर के घर पहुँचता है तो “साइयाँ जी दिलवा माँगे ले गमछा बिछाई के” गाना बजता है और मुजरा डान्स होता है। 

फ़िल्म में भोजपुरी:

फ़िल्म ने जितना हो सके बदलते बिहार और बदलते बिहारी की तस्वीर को साफ करने का प्रयास किया। गाना के साथ साथ गाना में जो बजता था वो भी ज़्यादातर पारम्परिक ढोल, नाल, शहनाई, मंजीरा, हरमुनियम, बैजों जैसे यंत्र ही थे। ये दौर बैजों का था, जो लौंडा डान्स में लौंडा के साथ साथ गाँव के लौंडों को भी थिरका देता था। बिहारी गाँव के आमिर लौंडे मुजरा और बाईजी डान्स पर थिरकते थे और गरीब घर के लौंडे बैजों पर लौंडा डान्स के साथ थिरकते थे। 

इस भोजपुरी फ़िल्म का एक और पक्ष है जो आपके साथ कुछ भी कर सकता है लेकिन थिरकाएगा तो बिलकुल नहीं।  इस फ़िल्म की हेरोईन रानी, का असली नाम रानी चटर्जी था लेकिन बिलकुल असली वाला नाम तो सबिहा शेख़ था। कहते हैं कि जब ये फ़िल्मी दुनियाँ में उतरी थी तो किसी डिरेक्टर ने इनका नाम सबिहा शेख़ से बदलकर रानी चटर्जी रख दिया था। मुस्लिम से सीधे भद्रलोक ब्राह्मण। एक तीर से दो शिकार मुस्लिम-फोबिया और जातीय भेदभाव का एक इलाज। फ़िल्म की हेरोईन तो अपने मुस्लिम होने का इलाज कर ली लेकिन अब भोजपुरी फ़िल्मों का इलाज कौन करेगा। 

इस “ससुरा बड़ा पैसे वाला” फ़िल्म के बाद जो कुछ हुआ वो अपलोग सब देख रहे हैं। इस फ़िल्म के गायक रधेश्यम रशिया ने इसके बाद भोजपुरी गानों में जो उत्पात मचाया उसे पवन सिंह से लेकर सब कोई आज तक ढो रहे हैं, जो भोजपुरी गानों के इस नंगेपन को झेल नहीं पाए वो छठ गीत से लेकर भिखारी ठाकुर को भी खूब गाया और नए नए पैदा हुए इन रशिया भोजपुरिया गायकों को भी खूब गरियाया।

इसी बहाने कम से कम भिखारी ठाकुर भी घर-घर तो पहुँचे, लौंडा डान्स करने वाले रामचंद्र माँझी को पद्मश्री का सम्मान तो मिला, बिहारी लौंडा डान्स को राष्ट्रीय ख्याति तो मिली। अब तो पंकज त्रिपाठी जैसे मेंस्ट्रीम बौलीवुड बिहारी ऐक्टर भी कपिल शर्मा के शो में लौंडा डान्स करने लगते हैं। देर से ही सही लेकिन इन प्रख्यात अभिनेताओं को उनका बिहारीपन की याद तो दिलाई गई। और इन सब की शुरुआत कहाँ से हुई थी? ससुरा बड़ा पैसे वाला से ही हुई थी।

वरना मुंबई जाने के बाद, वहाँ जम जाने के बाद, कौन बिहार और बिहारीपन की तरफ़ मुँह मोड़ के देखता था, वापस बिहार की तरफ़ मुहँ तो सिर्फ़ बिहारी मज़दूर करते थे, वो भी सिर्फ़ छठ और होली में। मनोज वाजपेयी जैसे लोग तो मस्त मसगुल थे सत्या और पिंजर जैसी राष्ट्रीय पुरस्कार जितने वाले फ़िल्मों में डूब रहते थे। लेकिन आजकल सरदार खान बनके पूरा इलाक़ा धुआँ धुआँ भी करते हैं और “बम्बई में का बा” गाने पर रैप डान्स भी करते हैं।

वैसे सबको बिहारीपन कि याद दिलाकर मनोज तिवारी भोजीवुड छोड़के आजकल नेता बन गए हैं, उनका भी पलायन हो चुका है। आजकल भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हैं, दो बार से सांसद भी हैं। सबको बिहारीपन और भोजपुरी गानों में डुबाने के बाद तिवारी जी भाजपा और मोदी भक्ति में डूब गए हैं। 

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Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
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