HomeCurrent Affairsसंविधान की 9वीं अनुसूची और बिहार आरक्षण विवाद

संविधान की 9वीं अनुसूची और बिहार आरक्षण विवाद

बिहार में आरक्षण की सीमा 75% किए जाने और उसके बाद इससे से सम्बंधित क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह करने के बाद संविधान की 9वीं अनुसूची पर फिर से विवाद शुरू हो गया है। हालाँकि यह विवाद बहुत पुराना भी है, अक्सर बार बार दोहराने वाला मुद्दा है। चुकी इस बार ये मुद्दा बिहार से बना है तो हम इसकी तहक़ीक़ात भी करेंगे कि क्यूँ ज़रूरी है या ज़रूरी नहीं है बिहार के नए आरक्षण नीति से सम्बंधित क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करना। इसके क्या फ़ायदे हैं, क्या अड़चन है, या फिर इसके बारे में क्या अफ़वाह उड़ाया जा रहा है।

विडीओ देखें:

शुरू करने से पहले संक्षेप में इतना जान लीजिए कि संविधान के इस 9वीं अनुसूची में कुल 282 क़ानून और अगर बिहार का ये आरक्षण क़ानून भी 9वीं अनुसूची में शामिल होता है तो वो 9वीं अनुसूची का 285वाँ क़ानून होगा। लेकिन इतना आसान नहीं है ये सब। संविधान की 9वीं अनुसूची में आख़री बार किसी क़ानून को साल 1995 में संविधान के 78वें संविधान संसोधन के तहत शामिल किया गया था। इस 78वीं संसोधन के तहत कुल 27 क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया था जिसमें बिहार का नौ क़ानून, पश्चिम बंगाल का सात, तमिलनाडु का चार, राजस्थान का तीन, केरल का दो, और कर्नाटक व उड़ीसा का एक-एक क़ानून शामिल था।

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साल 1995 के बाद संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल अलग अलग राज्यों से सम्बंधित क़ानूनों की संख्या।

ये आख़री मौक़ा था जब किसी भी राज्य या केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई किसी क़ानून को भारतीय संविधान कि 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इसके बाद पिछले 28 सालों के दौरान (1995 से 2023 तक) भारत में एक भी क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। जबकि साल 1995 से पहले नौवीं अनुसूची में लगातार नए क़ानून को जोड़ा जाता रहा है।

उदाहरण के लिए साल 1951 में पहली बार संविधान की 9वीं अनुसूची में 13 अलग अलग क़ानूनों को शामिल किया गया था। उसके बाद साल 1955 में फिर से 7 और साल 1964 में 44, 1972 में दो, 1974 में 20, और फिर साल 1976 में 102 क़ानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया। उसके बाद फिर साल 1984 में 12, 1990 में 55, 1994 में एक, और साल 1995 में 27 क़ानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इस दौरान साल 1978 में तीन क़ानूनों को संविधान की 9वीं सूची से बाहर भी किया गया था। और इस तरह से आज भारतीय संविधान की नौवीं सूची में 282 क़ानून शामिल है।

1995 से पहले ठीक एक साल पहले साल 1994 में तमिलनाडु सरकार द्वारा आरक्षण का दायरा बढ़ाकर 69% करने वाले क़ानून को 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया था। यह पहला और आख़री मौक़ा था जब संविधान की 9वीं अनुसूची में आरक्षण से सम्बंधित किसी भी क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया था।

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लेकिन ऐसा नहीं है कि साल 1995 के बाद किसी राज्य ने अपने राज्य में बनाए गए किसी क़ानून को 9वीं अनुसूची में शामिल करने का प्रयास नहीं किया, केंद्र सरकार को आग्रह नहीं किया, बल्कि एक नहीं कई राज्यों ने कई प्रयास किए लेकिन आज तक किसी राज्य को सफलता नहीं मिली है। प्रयास करने वाले राज्यों में झारखंड ने साल 2022 में झारखंड में स्थानिए निवासी और आरक्षण को 77% तक बढ़ाने सम्बन्धी फ़ैसले को 9वीं सूची में शामिल करने का आग्रह किया था।

इसी तरह से राजस्थान सरकार भी साल 2009 से ही कई बार भारत सरकार से गुजर आरक्षण को 9वीं सूची में शामिल करने का आग्रह करते रही है। अभी तक बिहार और झारखंड को तो सफलता नहीं मिली है और अब देखना ये है कि बिहार को इसमें सफलता मिलती है या नहीं। 

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बिहार सरकार के इसी दावे या केंद्र सरकार से आग्रह के लॉजिक को नकारने हुए 23 नवम्बर 2023 को बिहार के पूर्व-उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील मोदी जी ने अपने पार्टी के पटना कार्यालय में हुए एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स के दौरान एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि संविधान की नौवीं अनुसूची में रखे गए सभी क़ानून को न्यायालय में चुनौती दिया जा सकता है।

सुशील मोदी जी ने जो दावा किया वो न तो संविधान की नौवीं अनुसूची में लिखा हुआ है और न ही संविधान की धारा 31B में लिखा हुआ है। साल 1951 में संविधान के पहले संसोधन के तहत संविधान की इसी धारा 31B और 31C में संसोधन किया गया और यह क़ानून बनाया गया था कि संविधान की नौवीं अनुसूची में रखे किसी भी क़ानून को न्यायालय में चुनौती नहीं दिया जा सकता है फिर चाहे 9वीं अनुसूची में रखा वो क़ानून संविधान की धारा 14 या 19 की ही अवहेलना क्यूँ न कर रहा हो। संविधान की धारा 14 भारत के नागरिकों को समानता और धारा 19 बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

संविधान की 9वीं अनुसूची का यह धारा 31B और 31C में संसोधन इसलिए किया गया था क्यूँकि आज़ादी के बाद ज़मींदारी और रजवाड़ों की व्यवस्था ख़त्म करनी थी लेकिन ज़मींदारों या रजवाड़ों से उनकी समानता और बोलने की आज़ादी के अधिकार से वंचित किए बग़ैर उनकी ज़मीन और रियासत नहीं छीनी जा सकती थी।

इसलिए देश के अलग अलग ज़मींदारों और रियासतों से उनकी ज़मीन छिनने के लिए अलग अलग राज्यों में जो क़ानून बनाया गया उन सभी क़ानूनों को संविधान की 9वें भाग में रख दी गई। जैसे ही ज़मींदारों की ज़मींदारी छिनने के लिए इन क़ानूनों को संविधान के 9वें भाग में रखी गई तो उसके बाद ज़मींदार उनकी ज़मीन छिनने के ख़िलाफ़ कोर्ट नहीं जा सकते थे क्यूँकि संविधान के 9वें भाग के किसी भी क़ानून के तहत लिया गया कोई भी फ़ैसला के ख़िलाफ़ कोई कोर्ट नहीं जा सकता था। 

लेकिन साल 1973 में केशवनंदा भारती केस में सर्वोच्च नययालय ने यह फ़ैसला दिया था कि देश की सर्वोच्च न्यायालय देश की संसद या किसी भी राज्य की विधायिका द्वारा बनाए गए किसी भी क़ानून को रद्द कर सकता है अगर संसद या राज्य की विधायिका द्वारा बनाया गया वो क़ानून देश के संविधान की मूल संरचना को नुक़सान पहुँचा रहा हो फिर चाहे वो क़ानून संविधान कि 9वीं अनुसूची का ही हिस्सा क्यूँ ना हो।

सर्वोच्च न्यायालय और 9वीं अनुसूची:

सुशील मोदी जी 23 तारीख़ के प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में दरअसल सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे ही एक जज्मेंट की बात कर रहे थे। उन्होंने केशवनंदा भारती केस के बारे में भी बोला और साल 2007 के भी एक केस के बारे में भी बोला कि न्यायलय  को अधिकार है कि वो संविधान की 9वीं अनुसूची वाले क़ानून के तहत लिए गए फ़ैसले में भी सुनवाई कर सकती है। लेकिन सुशील मोदी जी ने इस सुनवाई की प्रक्रिया के बारे में नहीं बताया।

संविधान की 9वीं अनुसूची के क़ानून के तहत लिए गए किसी भी फ़ैसले के ख़िलाफ़ न्यायालय में सुनवाई की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि बहुत विरले केस में ही ऐसी सुनवाई हो पाती है। सर्वोच्च न्यायालय इस तरह के सभी के के जज्मेंट में यह बोल चुकी है कि संविधान की 9वीं अनुसूची में निर्गत क़ानून पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हो सकती है लेकिन तभी हो सकती है जब न्यायालय को लगे कि वो क़ानून संविधान की मौलिक अधिकार की धारा 14 और 19 के लिए ख़तरा है।

जब न्यायालय को यक़ीन हो जाए कि उक्त क़ानून से संविधान के मौलिक अधिकार को ख़तरा है तो फिर न्यायालय यह देखेगा कि क्या वह ख़तरा संविधान के मूल भावना और संरचना के लिए भी है और अगर सर्वोच्च न्यायालय को यक़ीन हो गया कि उस 9वीं अनुसूची वाले क़ानून से संविधान के मूल भावना और संरचना के लिए भी ख़तरा है तब जाकर सर्वोच्च न्यायालय उसपर सुनवाई करेगी करेगी।

अब देश में जातिगत आरक्षण बढ़ाना कैसे संविधान में मौलिक अधिकार के ख़िलाफ़ हो सकता है जब संविधान में आरक्षण खुद संविधान की मौलिक अधिकार की धारा 15 और 16 के तहत दी गई है? मतलब संविधान का एक मौलिक अधिकार संविधान के दूसरे मौलिक अधिकार के लिए ख़तरा बता दिया जाएगा तभी तो 9वीं अनुसूची में आरक्षण को डालने पर न्यायालय उसकी सुनवाई करेगी? और अगर ऐसा है तब तो इस क़ानून के तहत OBC का 27 प्रतिशत आरक्षण भी उसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय और संविधान की व्याख्या:

क़ायदे से देखें तो सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय संविधान के किसी भी क़ानून या अध्यादेश या फिर सरकार के किसी भी फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुनवाई कर सकती है क्यूँकि संविधान के किसी भी क़ानून का interpretation करने का अधिकार सिर्फ़ सर्वोच्च न्यायालय को ही है। संविधान के किसी भी धारा का interpretation करना सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार भी है और कर्तव्य भी है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक ही क़ानून का अलग अलग समय पर किया गया interpretation अलग अलग रहता है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक ही क़ानून का interpretation बदलते रहता है। और सर्वोच्च न्यायालय को संविधान और क़ानून का interpretation करने का अधिकार भी इसीलिए ही दिया गया है ताकि बदलते समय के साथ किसी भी क़ानून के interpretation में उसके अर्थ में, उसके व्यावहारिकता में बदलाव हो सके और देश का संविधान समय संगत रह सके।

अगर बिहार सरकार द्वारा आरक्षण बढ़ाने का फ़ैसला संविधान की 9वीं अनुसूची में जोड़ा जाता है तो इसके ख़िलाफ़ कोई भी सिर्फ़ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है, सेशन या फिर हाई कोर्ट में नहीं, और उस याचिका पर भी सुनवाई सिर्फ़ तभी होगी अगर कोर्ट को लगेगा कि बिहार सरकार द्वारा आरक्षण को बढ़ाने का फ़ैसला संविधान की धारा 14 और 19 के ख़िलाफ़ है। उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय को ये भी देखना पड़ेगा कि बिहार का ये आरक्षण बढ़ाने वाला क़ानून संविधान के मौलिक स्वरूप को तो नुक़सान नहीं पहुँचा रहा है। अगर पहुँचा रहा है तभी सर्वोच्च न्यायालय बिहार सरकार के इस आरक्षण बढ़ाने के क़ानून के ऊपर सुनवाई शुरू कर सकती है।

लेकिन अगर बिहार सरकार के इस क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जाता है तो देश के किसी भी न्यायालय में किसी भी हाई कोर्ट में कभी भी बिना रोक टोक के आरक्षण बढ़ाने वाले बिहार सरकार के इस क़ानून के ख़िलाफ़ अपील किया जा सकता है और सुनवाई शुरू कर सकती है।

कुछ ऐसा ही हुआ था बिहार सरकार द्वारा करवाए जा रहे जातीय गणना के दौरान जब बिहार सरकार के जातीय गणना करवाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पटना उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जनहित याचिका दायर कर दी गई थी जिसके कारण कुछ समय के लिए बिहार जातीय गणना को रोकना भी पड़ा। अगर बिहार में आरक्षण बढ़ाने के क़ानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया तो कभी भी कोई भी बिहार सरकार के आरक्षण बढ़ाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने कोर्ट जा सकता है। और इस तरह से बिहार सरकार के लिए एक फ़ालतू समस्या रोज़ पैदा लेते रहेगी। कोर्ट में केस लड़ने का। 

सुशील मोदी जी का कहना था कि संविधान की 9वीं अनुसूची के क़ानून ज़्यादातर सिर्फ़ ज़मींदारी बँटवारे से सम्बंधित है और यह प्रावधान विशेष परिस्थिति में जब देश की आज़ादी के बाद ज़मींदारी प्रथा ख़त्म करके ज़मींदारों की ज़मीन का बँटवारा ग़रीबों के बीच करना और बटाएदारों को ज़मीन पर मालिकाना हक़ देना ज़रूरी था। लेकिन संविधान की 9वीं अनुसूची में सिर्फ़ ज़मींदारी, भूमि वितरण या बटाएदारी से सम्बंधित क़ानून नहीं है। साल 1974 में केरल में काजू की निजी फ़ैक्टरी को सरकारी बनाने का क़ानून भी इसी संविधान की 9वीं अनुसूची में रखा गया था। इसी तरह से कई और क़ानूनों को नौवीं अनुसूची में रखा गया था जिसका भूमि सुधार से कोई लेना देना नहीं है।

जैसे कि 1976 का The Levy Sugar Price Equalisation Fund Act, The Departmentalisation of Union Accounts Act 1976, The Thiruppuvaram Payment Abolition Act 1969, The Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Activities Act 1976, The Bonded Labour System Abolition Act 1976, The Essential Commodities Act 1955, Section 66A and Chapter IVA of the Mother Vehicles Act 1939, The Coal Mines Act 1974 और भी भरे पड़े हैं कुल इसमें मतलब नौवीं अनुसूची में 284 क़ानून हैं। 

भारत सरकार को समझना चाहिए कि जब देश आज़ाद हुआ था तब ज़मींदारी ख़त्म करना, कृषि मज़दूरों और बटाईदारों को ज़मीन पर उनका हक़ देना देश और समय की मुख्य माँग थी इसलिए उस समय ज़्यादातर इसी से सम्बंधित क़ानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, उसके बाद जब 1970 के दशक के दौरान देश में नक्सल आंदोलन मज़बूत हुआ, वामपन्थ मज़बूत हुआ तो मज़दूरों, फ़ैक्टरी, जंगल और ज़मीन से सम्बंधित क़ानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया और अब 1990 के दशक में जब सामाजिक न्याय और जातीय न्याय की लड़ाई लड़ी जा रही है तो जाति से सम्बंधित क़ानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए।

1990 के दशक से पहले इस देश में कोई पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू करने की हिम्मत नहीं करता था और कर्पूरी ठाकुर जैसे लोगों ने जब हिम्मत किया, पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया तो सबलोग एक होकर उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटा दिए, लेकिन अब समय बदल चुका है, अब आरक्षण से सम्बन्धी क़ानून को नौवीं अनुसूची में डालकर न्यायालय  का समय बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।

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Raavan Kumar
Raavan Kumar
Raavan Kumar is based in Uttarakhand and do business only in writing.
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