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2024 Loksabha Election: फूलपुर लोकसभा क्षेत्र का पूरा गणित, भूगोल, विज्ञान और नीतीश कुमार का भविष्य

नीतीश कुमार उसी फूलपुर लोकसभा सीट से अगला लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं जिस फूलपुर ने राम मनोहर लोहिया को देश का लोहिया बनाया था। इसी फूलपुर ने जनेश्वर मिश्रा को छोटा लोहिया की उपाधि दिया था और इसी फूलपुर ने भारत को V P सिंह जैसा पिछड़ों का मसीहा दिया था। जाति के नज़रिए से देखें तो पिछड़ा बहुल लोकसभा क्षेत्र होने के बावजूद, फूलपुर ने किसी प्रसिद्ध पिछड़े को अपना नेता नहीं बनाया लेकिन V P सिंह और लोहिया जैसे पिछड़ों के मसीहा को जन्म ज़रूर दे चुकी है। 

अब या जातीय समीकरण को देखे या फिर पुलपुर लोकसभा में भाजपा-संघ का चुनावी पर्फ़ॉर्मन्स का इतिहास देखें या फिर फूलपुर लोकसभा में आने वाले सभी विधानसभा सीटों का चुनावी इतिहास देखें, सबमें यही साफ होता है कि फूलपुर में भाजपा का कोई स्थानीय नेता नहीं रहा है अब तक। आज भी फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के सभी सांसद और विधायक जो आज भाजपा में हैं उनमें से ज़्यादातर या तो ग़ैर-भाजपा नेता, विधायक और सांसद रह चुके हैं, या फिर किसी न किसी ग़ैर-भाजपा राजनीतिक दलों के टिकट पर किसी न किसी तरह का चुनाव लड़ चुके हैं।

नीतीश कुमार का फूलपुर से चुनाव लड़ने पर क्या बोले बिहारवासी | News Hunters |

एक मात्र भाजपा नेता जो प्रयागराज पश्चिम विधानसभा से विधायक हैं वही हैं जो शुरू से ही भाजपा से जुड़े हुए थे और उनका भी वंश कांग्रेस नेता लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ा हुआ है। प्रयागराज पश्चिम विधानसभा से भाजपा विधायक सिद्धार्थ नाथ सिंह लाल बहादुर शास्त्री के पोता हैं। आज न्यूज़ हंटर्ज़ पर फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण से चुनावी इतिहास तक सभी का चीर फाड़ किया जाएगा।  

फूलपुर लोकसभा क्षेत्र का जातीय समीकरण:

फूलपुर लोकसभा में पिछले लोकसभा चुनाव के आँकड़ों के अनुसार सबसे ज़्यादा तक़रीबन 3 लाख कुर्मी वोटर हैं, 1 लाख जाटव और लगभग 1.5 लाख ग़ैर-जाटव दलित वोटर हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में लगभग दो लाख मुस्लिम, दो लाख ब्राह्मण और दो लाख ही यादव वोटर हैं। इसके साथ साथ पिछड़े जातियों में से बिंद, निषाद, प्रजापति के वोटरों की संख्या लगभग एक लाख है और एक लाख वोटर विश्वाकर्मा, मौर्य और कुशवाहा जाति का वोट है।

आप कुछ न्यूज़ वलों को ये दावा करते हुए देखेंगे कि फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में लगभग चार लाख दलित वोटर हैं लेकिन उनका यह दावा ग़लत इसलिए हैं क्यूँकि उनकी गणना ग़लत है। दरअसल वो इलाहबाद ज़िले में लगभग 21% दलित आबादी के आधार पर यह तय कर लेते हैं कि चुकी फूलपुर में कुल वोटेरों की संख्या लगभग बीस लाख है इसलिए बीस लाख का 21% लगभग चार लाख होता है इसलिए फूलपुर में चार लाख दलित वोटर हैं। लेकिन उन्हें ये नहीं पता है कि पूरे इलाहबाद ज़िले में तीन दलित बहुल विधानसभा क्षेत्र हैं और उन तीन में से दो विधानसभा क्षेत्र फूलपुर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा ही नहीं है। 

Complete Story of Phulpur (Uttar Pradesh) Lok Sabha Constituency | News Hunters |

इलाहबाद ज़िले में जैसे जैसे कांग्रेस दलितों के बीच अपना वोट खोते गई वैसे वैसे कांग्रेस ने डिलिमिटेशन के ज़रिए दलित बहुल क्षेत्रों को फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से अलग करते गई। दलित और राजपूत बहुल कौशाम्बी को अलग ज़िला बना दिया गया और फिर अलग कौसम्बी लोकसभा क्षेत्र बना दिया गया। इसी तरह से प्रयागराज लोकसभा क्षेत्र में ब्राह्मणों को एकत्रित किया गया और फूलपुर में कुर्मी और अन्य पिछड़ों को एकत्रित किया गया। यही कारण है कि पिछले पचास सालों के दौरान प्रयागराज से ज़्यादातर सांसद ब्राह्मण चुने गए और फूलपुर से पिछड़ी जातियों से चुने गए है।

साल 1967 में नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के बाद आज तक फूलपुर में सिर्फ़ एक अगडी जाति का सांसद चुना गया और वो भी BSP के टिकट, एक दबंग ब्राह्मण कपिल मुनि करवारिया साल 2009 में पुलपुर से सांसद बने थे। लेकिन इतने तोड़ जोड़ के बावजूद धीरे धीरे कांग्रेस फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में दलित, मुस्लिम और कुर्मी के साथ साथ ब्राह्मण वोटेरों का भी समर्थन खोते चली गई।

अब इस फूलपुर लोकसभा क्षेत्र की लड़ाई में एक तरफ़ यादव+मुस्लिम+ठाकुर और दूसरी तरफ़ दलित+ब्राह्मण है। और इस लड़ाई में कल तक काक्टेल की तरह इधर से उधर शिफ़्ट करने वाले कुर्मी समाज के वोटर, एक दिग्गज कुर्मी नेता के अभाव में कभी दलित+ब्राह्मण वाले मायावती की तरफ़ लुढ़कते थे तो कभी यादव+मुस्लिम+ठाकुर वाले सपा की तरफ़ लुढ़कते थे।

वैसे पिछले दो चुनाव से तो ब्राह्मण पूरी तरह भाजपा की झोली में आ चुके हैं और और उसके ऊपर से कुर्मी, और अन्य पिछड़ों की मदद से भाजपा लगातार चुनाव जीत रही है 2014 से। साल 2014 में भी फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में लड़ाई यादव बनाम कुर्मी के बीच ही हुआ था जब भाजपा की उम्मीदवार केशरी देवी पटेल ने सपा के पनधारी यादव को 1,71,968 वोटों से हरा दिया था।

अब अगर ऐसे में जहां चुनाव का माहौल यादव बनाम कुर्मी का हो वहाँ पर नीतीश कुमार जाकर यादव और कुर्मी को एक मंच पर लाने का प्रयास करेंगे तो वो कितना सफल होगा ये तो समय ही बताएगा लेकिन अगर नीतीश कुमार फूलपुर के कुर्मी और यादव को एक मंच पर लाने में सफल होते हैं तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होगा जिसका बहुत दूरगामी परिणाम भाजपा को न सिर्फ़ लोकसभा चुनाव में डैमिज करेगा बल्कि अगले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिया बड़ा परेशानी का सबब बन सकता है।

लेकिन पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी फ़ैक्टर को थोड़ा गहराई से समझते हैं। मुस्लिम को छोड़ दीजिए क्यूँकि जो देश में माहौल है और जो नीतीश कुमार की सेक्युलर छवि है उसमें मुस्लिम नीतीश कुमार को वोट नहीं दें उसके पीछे कोई तर्क देना मुश्किल है। इसलिए सबसे पहले समझिए कुर्मी फ़ैक्टर को।

पूरे उत्तर प्रदेश में कुर्मी जाति की जनसंख्या लगभग 9% है हालाँकि कुछ लोग इसे 6% भी मानते हैं लेकिन 6% भी है तो भी यादव और मुस्लिम के बाद कुर्मी उत्तर प्रदेश का तीसरा सबसे बड़े मतदाता जाति है। कुर्मी उत्तर प्रदेश के कुल OBC आबादी का लगभग 35% हिस्सा है। इसलिए अखिलेश यादव के लिए नीतीश कुमार का फूलपुर से चुनाव लड़ना सोने पे सुहागा जैसा है।

उत्तर प्रदेश में Sant Kabir Nagar, Maharajganj, Kushinagar, Mirzapur, Sonbhadra, Bareilly, Unnao, Jalaun, Fatehpur, Pratapgarh, Kaushambi, Prayagraj, Sitapur, Bahraich, Shravasti, Balrampur, Siddharth Nagar, Basti, Barabanki, Kanpur, Akbarpur, Etah, Bareilly, Lakhimpur, Phulpur, Kannauj, Pilibhit, Rampur, Misrikh, Damunriyaganj, Faizabad, Gonda and Jaunpur, समेत कुल 33 ऐसे लोक सभा क्षेत्र हैं जहां कुर्मी जाति के वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

इन 33 में से 10-12 सीट तो ऐसे हैं जहां कोई भी बिना कुर्मी वोट के चुनाव जितने का सोच भी नहीं सकता है और फूलपुर इन्हीं 10-12 सीटों में से सबसे प्रमुख है, जहां बिना कुर्मी वोटर के कोई चुनाव जितने की सोच नहीं सकता है। इसी तरह से पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग डेढ़ सौ से अधिक ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां कुर्मी निर्णायक भूमिका निभाते है और 36 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां कोई भी बिना कुर्मी वोट के चुनाव जितने का सोच भी नहीं सकता है। 

नीतीश कुमार कुर्मी तो हैं लेकिन उन्होंने कभी कुर्मी जाति की राजनीति नहीं की है जैसे लालू यादव ने बिहार में और मुलायम-अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में यादव जाति की राजनीति की थी। उसके ऊपर से उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज तक कभी भी कुर्मी जाति के लोग किसी एक कुर्मी नेता को अपना नेता नहीं बना पाए हैं।

सोने लाल पटेल ने इस ओर मतलब उत्तर प्रदेश में कुर्मियों  का अलग राजनीतिक दल बनाने का बहुत प्रयास किया लेकिन कुर्मी पहचान को उत्तर प्रदेश में खड़ा नहीं कर पाए। सोने लाल पटेल हमेशा मायावती की बैसाखी की तरह रहे और जैसे ही सोने लाल पटेल का देहांत हुआ और मायावती का पतन हुआ वैसे ही सोने लाल का अपना दल दो हिस्से में बंट गया। एक हिस्सा भाजपा ने लपका और दूसरा सपा ने।

कुर्मी बनाम यादव:

जो कुर्मी यादव-कुर्मी की एकता के सहारे पिछड़ों की एकता का नारे दे रहे हैं वो सपा के साथ हैं और जो कुर्मी यादव के साथ अपने प्रतिद्वांध का इतिहास भुलाने को तैयार नहीं है वो भाजपा के साथ हैं। अनुप्रिया पटेल वाला हिस्सा भाजपा के साथ और पल्लवी पटेल और इन दोनो की माँ वाला हिस्सा सपा के साथ है। दोनो पार्टियों का नाम अपना दल ही है: एक अपना दल और दूसरा अपना दल (S)। 

जब उत्तर प्रदेश के कुर्मी नेता और वो भी एक ही परिवार के कुर्मी नेता आपस में लड़ रहे हैं, ऐसे में नीतीश कुमार का उत्तर प्रदेश में जाकर कुर्मी-यादव की एकता और पिछड़ों की एकता का आवाज़ उठाना कितना सफल होता है वो तो इसी बात पर निर्भर करेगा कि उत्तर प्रदेश का कुर्मी समाज एक बिहारी को कितना अपना पाता है और इस बात कर पर भी निर्भर करेगा कि उत्तर प्रदेश के कुर्मी समाज के लोग यादव के साथ अपनी लड़ाई के इतिहास को कितना भुला पाते हैं।

बिहार में नतीश कुमार ने RJD के साथ महगठबँधन बनाकर कुर्मी-यादव एकता का खूब प्रयास किया और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं लेकिन बिहार में अभी भी कुर्मी जाति का एक बड़ा हिस्सा है जो महगठबँधन को वोट सिर्फ़ इसलिए देता हैं क्यूँकि नीतीश कुमार उनके नेता हैं लेकिन वो अभी भी पिछड़ों के नाम पर यादव-कुर्मी एकता जैसी किसी भी गणित को लम्बे समय तक मनाने को तैयार नहीं है।

इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि जिस तरह से बिहार में कुर्मी और यादव समाज का परस्पर विरोधी रहने का बहुत लम्बा इतिहास रहा है उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी कुर्मी और यादव कभी एक साथ नहीं आ पाते हैं। जैसा कि हमने आपको इसके पहले वो यादव+मुस्लिम+ठाकुर बनाम दलित+ब्राह्मण+कुर्मी वाला गणित के बारे में बताया था। हालाँकि कुर्मी और यादव दोनों पिछड़े समाज से है, OBC से हैं, लेकिन उसके बावजूद इनके बीच में पटती नहीं है, बनती नहीं है। 

पिछले दो चुनाव से कुर्मी वोटर फूलपुर में सपा के साथ कम और भाजपा के साथ ज़्यादा हैं और उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में कुर्मी और यादव हमेशा से एक दूसरे के विरोधी जाति रही है। इसके पहले जब उत्तर प्रदेश में राजनीतिक लड़ाई मायावती और मुलायम-अखिलेश के बीच होती थी तब उत्तर प्रदेश का अधिकतर कुर्मी वोटर मायावती के साथ रहता था।

फूलपुर लोकसभा का इतिहास रहा है यादव बनाम कुर्मी-दलित का और वो इतिहास भाजपा, मायावती या मुलायम के जन्म से भी पहले तक जाता है। 1980 तक जब फूलपुर सीट पर कांग्रेस का दवदवा हुआ करता था तब कांग्रेस को ब्राह्मण और दलित के साथ साथ कुर्मी वोटेरों का पूरा समर्थन हुआ करता था जबकी दूसरी तरफ़ संसोपा या जनता पार्टी का चेहरा लोहिया जैसे यादव होते थे। 

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ये वही फूलपुर लोकसभा सीट हैं जिसने राम मनोहर लोहिया को देश का लोहिया बनाया था, जिसने लोहिया को राष्ट्रीय स्तर का नेता बनाया था जिसने लोहिया को JP के साथ कांग्रेस-विरोधी राजनीति का दो प्रमुख स्तम्भ बनाया था। दरअसल हुआ ये था कि 1962 के लोकसभा में लोहिया ने सीधे नेहरू को फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से टक्कर देने का फ़ैसला लिया।

लोहिया का ये फ़ैसला उनकी पार्टी संसोपा के नियमों के ख़िलाफ़ था क्यूँकि संसोपा के संविधान के अनुसार उस समय संसोपा सिर्फ़ उसी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ती थी जहां पार्टी के सदस्यों की न्यूनतम संख्या हो, क्षेत्र में पार्टी की पूरी कार्यकारनी पहले से ही गठित और संचालित हो, और सबसे ज़रूरी उस लोकसभा क्षेत्र के कम से कम एक तिहाई मतदान केंद्र पर पार्टी के सदस्य हो जो बूथ पर मतदान को मैनिज कर सकें।

लेकिन चुकी फूलपुर लोकसभा क्षेत्र प्रधानमंत्री नेहरू का क्षेत्र था, और नेहरू उस दौर में न सिर्फ़ देश के प्रधानमंत्री थे बल्कि देश के हीरो थे और उसके ऊपर से फूलपुर में नेहरू का पुस्तैनी घर था, इसलिए उनके क्षेत्र में संसोपा के लिए एक तिहाई बूथ पर  पार्टी के सदस्य इकट्ठा करना लगभग असम्भव था इसलिए लोहिया ने जब नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया था तब संसोपा के इन तीनों नियमों के परे जाकर यह चुनाव लड़ा गया था। 

1962 के बाद 1964 में नेहरू का निधन हुआ और फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित सांसद बनी लेकिन इंदिरा गांधी के साथ बढ़ती दूरियों के कारण 1968 में उन्होंने संसद से इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद नेहरू परिवार कभी दुबारा फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ा। 1969 में जब मध्यवती चुनाव हुआ तो कांग्रेस वहाँ से चुनाव हार गई। फूलपुर लोकसभा क्षेत्र नेहरू परिवार का सीट था कांग्रेस का नहीं। शायद यही कारण है कि 1969 के मध्यवती चुनाव में छोटे लोहिया के नाम से प्रसिद्ध जागेश्वर मिश्रा ने इस चुनाव में इंदिरा सरकार में पेट्रोलियम मंत्री K D मालवीय को हरा दिया था।

फूलपुर और कुर्मी:

इसके बाद फूलपुर लोकसभा दुबारा कभी अगड़ों-पिछड़ों और कांग्रेस विरोधी राजनीति के द्वंध से बाहर नहीं निकला। विजय लक्ष्मी पंडित के इस्तीफ़े के बाद फूलपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की मात्र दो बार जीत हुई और उसमें भी एक बार जीते पिछड़ों की राजनीति करने वाले VP सिंह और एक बार जीते राम पूजन पटेल जो खुद भी पिछड़ा थे।

राम पूजन पटेल अपने तीन बार के संसदीय कार्यकाल में मात्र एक बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े जबकी बाक़ी दोनो बार कांग्रेस के ख़िलाफ़ चुनाव लड़े। राम पूजन पटेल से पहले BD सिंह फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के पहले कुर्मी सांसद थे जो फूलपुर से 1980 में चुनाव जीते थे। और फिर उसके बाद तीन बार राम पूजन पटेल और उनके बाद जंग बहादुर पटेल दो बार और धर्मराज सिंह पटेल एक बार यहाँ से सांसद बने। इस तरह से 1980 से लेकर 1999 तक फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से सिर्फ़ कुर्मी सांसद बने। और इस दौरान जो भी यहाँ से चुनाव जीता उसने मुस्लिम+यादव+पटेल के इसी फ़ोर्मूले का इस्तेमाल किया।

सपा या जनता पार्टी के टिकट पर लड़ने के कारण इन्हें यादवों और मुस्लिम का वोट मिला और खुद कुर्मी जाति का होने के कारण कुर्मी का वोट मिल गया। लेकिन 2004 आते आते जैसे बिहार में में ग़ैर-यादव वोटर लालू यादव से नाराज़ होने लगे उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी ग़ैर-यादव वोटर मुलायम सिंह की सपा से नाराज़ होने लगे। सपा की कुर्मी से बढ़ती दूरियों के कारण सोने लाल पटेल ने 1995 में अपना दल बनाया और बदले में सपा ने 2004 के लोकसभा चुनाव में किसी कुर्मी को टिकट देने की जगह एक मुस्लिम अतिक अहमद को टिकट दिया और अतिक अहमद जीते भी।

इस तरह से उत्तर प्रदेश का यह मुस्लिम+यादव+पटेल फ़ॉर्म्युला टूट गया और इस टूट का अगले चुनाव में BSP ने फ़ायदा उठाया और फिर उसके बाद भाजपा ने। 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले तक फूलपुर  लोकसभा सीट पर सपा का दबदबा रहा और उस सपा के दबदबे में कुर्मी समाज का वोट फ़्रंट पर रहकर लगातार सात बार फूलपुर लोकसभा सीट से कुर्मी उमीदवर चुनाव जीते। लेकिन 2004 में मुस्लिम+यादव+पटेल का यह फ़ॉर्म्युला टूट जाने के कारण अगले तीन लोकसभा चुनाव तक 2014 तक फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से कोई भी कुर्मी चुनाव नहीं जीत पाया।

2009 में ब्राह्मण उम्मीदवार कपिल मुनि करवारिया के चुनाव जितने का मुख्य कारण था उनका धन, दबंगी और BSP से टिकट मिलना। BSP से टिकट मिलने के कारण कपिल मुनि को दलितों का साथ मिल गया, खुद ब्राह्मण थे तो ब्राह्मण का भी वोट मिला और उसके ऊपर से कुर्मी ने भी इनका साथ दे दिया क्यूँकि SP ने भी किसी कुर्मी को टिकट नहीं दिया था। हालाँकि बाद में BSP ने भी कपिल मुनि करवारिया को पार्टी से निकाल दिया और अखिलेश सरकार ने उन्हें उम्रक़ैद के साथ जेल भी भेज दिया।

अतिक अहमद की हत्या के बाद सपा के पास न तो कोई क़द्दावर मुस्लिम उम्मीदवार है और न ही कोई कुर्मी उम्मीदवार। फूलपुर लोकसभा सीट का इतिहास तो यही कहता है कि इस सीट पर आज तक कोई भी यादव उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पाया है और अतिक अहमद को छोड़ दें तो कोई मुस्लिम भी फूलपुर से चुनाव नहीं जीत पाया है। सिर्फ़ मुस्लिम और यादव के वोट के दम पर यहाँ विधानसभा चुनाव तो जीता जा सकता है लेकिन लोकसभा चुनाव जितना सम्भव नहीं है, इसलिए अगर इस यादव+मुस्लिम फ़ोर्मूले में नीतीश कुमार आकर कुर्मी वोट जोड़ने में सफल होते हैं तो उनकी जीत हो सकती है। 

फूलपुर और भाजपा:

फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में बारे में एक और विचित्र बात ये है कि 1980 के दशक से अब तक अपना दल के संस्थापक राम पूजन पटेल को छोड़ दें तो कोई भी लोकसभा प्रत्याशी स्थानीय नहीं रहा है। इसके अलावा फूलपुर लोकसभा में केशव प्रसाद मौर्य को छोड़ दें तो भाजपा का कोई भी सांसद या विधायक ऐसा नहीं है जो पहले किसी और राजनीतिक दल में नहीं रह चुका है।

उदाहरण के लिए फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से वर्तमान भाजपा सांसद केशरी देवी पटेल चित्रकूट ज़िले से हैं और इसके पहले दो बार BSP के टिकट पर फूलपुर से ही लोकसभा चुनाव लड़ चुकी थी। इसी तरह से फूलपुर विधानसभा क्षेत्र से दो बार से भाजपा के विधायक परवीन कुमार पटेल, प्रयागराज उत्तरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक हर्षवर्धन बाजपेई और फफ़माऊ विधानसभा से भाजपा विधायक गुरु प्रसाद मौर्य तीनों पहले BSP से विधानसभा चुनाव लड़ चुके थे। और सरोन विधानसभा क्षेत्र में आज तक भाजपा के लिए कभी जीतना तो दूर की बात है कभी दूसरे नम्बर पर भी नहीं रही है।

आख़री बार भाजपा ने इस सीट पर 2017 में चुनाव लड़ी थी और चौथे नम्बर पर रही थी। इसलिए फूलपुर लोकसभा क्षेत्र पर भाजपा का न तो बहुत मज़बूत कार्यकर्ता और संगठन है और न ही भाजपा इस सीट पर नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ स्थानिये बाहरी का कार्ड खेल नहीं पाएगी। 

चुकी फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में भाजपा का संगठन बहुत कमजोर है और भाजपा का कोई स्थानिये मज़बूत नेता भी नहीं है इसलिए भाजपा यहाँ सभी चुनाव या तो मोदी के नाम पर लड़ती है या योगी के नाम पर लड़ती है। भाजपा ने पिछला दोनो फूलपुर लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 मोदी के नाम पर लड़ा और जीता लेकिन जब इसी फूलपुर में 2018 में मध्यावती चुनाव हुआ और मोदी का फ़ैक्टर को चुनावी मैदान में उतारा नहीं गया तो भाजपा फूलपुर से लगभग 60 हज़ार वोटों लोकसभा चुनाव हार गई और सपा जीत गई।

यह चुनाव सपा इसके बावजूद जीती कि यहाँ से भाजपा और सपा दोनो का उम्मीदवार कुर्मी जाति से था, कांग्रेस ने अपना अलग उम्मीदवार उतारा था और सपा नेता अतिक अहमद निर्दलीय चुनाव लड़े थे। लेकिन इन सबके बावजूद सपा जीत गई। कहने का मतलब साफ है, फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के यादव सपा को ही वोट देते हैं और फूलपुर के मुसलमान भी सपा को ही वोट देते हैं। अगर फूलपुर के मुसलमान अपने मुस्लिम नेता को वोट देते तो अतिक अहमद जैसा दिग्गज नेता को निर्दलीय में पचास हज़ार भी वोट न आए ऐसा हो ही नहीं सकता था। 

फूलपुर लोकसभा सीट पर मुस्लिम और यादव दोनो को छोड़ दीजिए क्यूँकि ये दोनो समाज के लोग नीतीश कुमार को समर्थन देंगे ही। सवाल उठता है कि आख़िर यादव समाज के लोग नीतीश कुमार को समर्थन क्यूँ देंगे? क्यूँकि नीतीश कुमार का इस सीट से जितना प्रदेश में कुर्मी यादव की दोस्ती का एक नया इतिहास लिख सकता है और सपा के लिए उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी की कुंजी बन सकती है। सपा नेता बार बार यूँ ही नहीं नीतीश कुमार को खुलेआम आमंत्रण दे रहे हैं फूलपुर से चुनाव लड़ने के लिए।

सपा को पता है कि अगर उत्तर प्रदेश का कुर्मी समाज उनके साथ आ गया तो भाजपा ने जो दलित+ब्राह्मण+राजपूत+पटेल+अत्यंत पिछड़ा वर्ग का जो गणित बिठाकर लगातार चुनाव जीत रही है उसमें सबसे बड़ा सेंध होगा। जैसा की हमने पहले भी आपको बताया था कि कैसे कुर्मी उत्तर प्रदेश के 10-12 लोकसभा और 36 विधानसभा सीट पर अपना एकतरफ़ा दबदबा रखने के अलावा तीन दर्जन लोक सभा और लगभग डेढ़ सौ विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है।

यादव+कुर्मी के इस गणित का नजारा उत्तर प्रदेश साल 2022 के चुनाव में देख चुकी है जब सिरथु विधानसभा क्षेत्र से अपना दल के पल्लवी पटेल ने भाजपा के दिग्गज नेता केशव प्रसाद मौर्य को 7,337 वोटों से हरा दिया था। भाजपा की इस करारी हार के बाद से ही उत्तर प्रदेश में सिरथु मॉडल की चर्चा होने लगी थी। सिरथु मॉडल का मतलब हुआ जब कुर्मी और यादव एक साथ एक गठबंधन में आ जाएँ।

लेकिन 2022 के इस सिरथु मॉडल के साथ समस्या ये है कि उत्तर प्रदेश में कुर्मी की एकमात्र राजनीतिक दल अपना दल दो हिस्सों में बट चुका है। एक हिस्सा सपा के साथ है और एक हिस्सा भाजपा के साथ है। अब नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश के इस बटे हुए कुर्मी वोटेरों को कितना एक साथ ला पाते हैं ये तो समय ही बताएगा लेकिन फ़िलहाल नीतीश कुमार को यादव और मुस्लिम वोटेरों की चिंता नहीं करनी चाहिए। 

कुर्मी, यादव, मुस्लिम के अलावा नीतीश कुमार के लिए दलित वोटेरों को रिझाना बड़ा मुश्किल होगा ख़ासकर जब मायावती INDIA गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं है। इसके अलावा फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में कुशवाहा मतलब की मौर्य जाति की भी अच्छी ख़ासी आबादी है जो अभी तक भाजपा को वोट कर रही है। इसी तरह से पासी समाज का भी अच्छा ख़ासा वोट है फूलपुर में, जो कम से कम बिहार में तो नीतीश कुमार से नाखुश है क्यूँकि नीतीश कुमार ने उनकी पुश्तैनी रोज़गार ताड़ी पर प्रतिबंध लगा दिया है।

कुल मिला जुलाकर यह कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार का फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फ़ैसला जितना नीतीश कुमार के लिए फ़ायदेमंद होगा उससे कहीं अधिक सपा और अखिलेश के लिए हो सकता है। और क्या पता इसी प्रयास में सपा के साथ गठबंधन वाली अपना दल, मतलब राम पूजन पटेल की पत्नी वाला अपना दल, पल्लवी पटेल वाला अपना दल सिरथु मॉडल वाला अपना दल को फिर से नीतीश कुमार के चेहरे के सहारे पूरे उत्तर प्रदेश में कुर्मी पहचान मिल जाए।

लेकिन ये सब इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार कितना हद तक कुर्मी पहचान के साथ उत्तर प्रदेश में चुनावी प्रचार करते हैं, सपा के नेता और कार्यकर्ता कितना हद तक कुर्मी वोटेरों को सहज और सुरक्षित महसूस करा पाते हैं और अपना दल के साथ कितना मधुर सम्बंध बना पाते हैं बाक़ी भाजपा तो अपनी चाल चलेगी ही। भाजपा फूलपुर से मुस्लिम उम्मीदवार दे नहीं सकती है, यादव उम्मीदवार देना ख़तरे से ख़ाली नहीं है और बिना मायावती को NDA में शामिल किए हुए दलित उम्मीदवार बनाना भाजपा को फूलपुर से जीत दिल नहीं सकती है। तो फ़िलहाल तो नीतीश कुमार फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से लीड कर रहे हैं।

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Sweety Tindde
Sweety Tinddehttp://huntthehaunted.com
Sweety Tindde works with Azim Premji Foundation as a 'Resource Person' in Srinagar Garhwal.
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